एसटी-एससी एक्ट का खुलेआम दुरुपयोग: झारखंड में सवर्ण परिवार पर टूटा मंत्री का कहर
पलामू Minister’s wrath falls on upper caste family झारखंड के पलामू जिले के छत्तरपुर विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों एक ऐसा मामला सुर्खियों में है जो न सिर्फ एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट के कथित दुरुपयोग को उजागर करता है, बल्कि सत्ता के नशे में चूर एक मंत्री की निजी रंजिश को भी सामने लाता है। राज्य के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राधा कृष्ण किशोर (जो स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं) पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि वे अपने पद की ताकत का इस्तेमाल कर एक राजपूत (सवर्ण) परिवार को पूरी तरह बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। पीड़ित परिवार का कहना है कि मंत्री ने निजी दुश्मनी के चलते फर्जी मुकदमे ठोंके, बुजुर्ग महिला मुखिया को निलंबित करवाया और पूरे परिवार को आत्महत्या की कगार पर ला खड़ा किया है।
मामला क्या है? Minister’s wrath falls on upper caste family
विवाद की जड़ एक फेसबुक पोस्ट है। पीड़ित परिवार के रंजीत कुमार सिंह (पेशे से शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता) ने साल २०२४ में अपने फेसबुक वॉल पर मंत्री राधा कृष्ण किशोर के कार्यों की आलोचना करते हुए एक पोस्ट लिखी थी। पोस्ट में न तो कोई जातिसूचक शब्द था, न कोई गाली और न ही किसी तरह का अपमानजनक कंटेंट। फिर भी मंत्री ने इसे “जातिसूचक अपमान” बताकर छत्तरपुर थाने में एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया। केस नंबर १८२/२०२४ दर्ज हुआ और रंजीत सिंह सहित उनके पूरे परिवार को आरोपी बना दिया गया।परिवार का दावा है कि पोस्ट में सिर्फ मंत्री के भ्रष्टाचार और मनमानी की बात थी। फिर भी मंत्री ने पुलिस पर दबाव डालकर तुरंत गिरफ्तारी का आदेश दिलवाया। रंजीत सिंह को अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े।
यह कोई पहला मामला नहीं
परिवार के सदस्य बताते हैं कि मंत्री और उनके बीच दुश्मनी साल 2022-23 से चल रही है। उस समय भी एक जमीन विवाद को लेकर मंत्री ने रंजीत सिंह, उनकी बुजुर्ग मां (जो ग्राम पंचायत की निर्वाचित मुखिया हैं) और बाहर पढ़ रहे उनके नाबालिग भतीजे तक को फर्जी मुकदमे में फंसाया था। उस केस में भी एससी-एसटी एक्ट की धाराएं लगाई गई थीं।हालांकि पलामू जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले को पूरी तरह फर्जी मानते हुए रंजीत सिंह के नाबालिग भतीजे को क्लीन चिट दे दी और एंटीसिपेटरी बेल दे दी। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि “प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता नहीं दिख रहा।”
मुखिया को निलंबित करवाने की साजिश
साल 2024 में मंत्री ने एक और बड़ा हमला बोला। उन्होंने प्रशासनिक दबाव डालकर रंजीत सिंह की मां (जो छत्तरपुर प्रखंड की एक ग्राम पंचायत की निर्वाचित मुखिया हैं) को फर्जी शिकायत के आधार पर निलंबित करवा दिया। आरोप था कि मुखिया ने मनरेगा में गड़बड़ी की है। लेकिन रांची हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद निलंबन को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित करते हुए तुरंत बहाल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “यह निलंबन राजनीतिक दबाव में किया गया प्रतीत होता है।”
परिवार की बुजुर्ग महिला की हालत गंभीर
70 वर्षीय मुखिया इन दिनों सदमे में हैं। परिवार के सदस्य बताते हैं कि लगातार मुकदमों और अपमान के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई है। वे कई बार बेहोश हो चुकी हैं और इलाज चल रहा है। परिवार का कहना है कि मंत्री का मकसद पूरा परिवार को मानसिक रूप से तोड़ना है ताकि कोई भी उनकी आवाज न उठा सके।
सवर्ण समाज में आक्रोश
इस मामले ने पूरे पलामू और मेदिनीनगर में सवर्ण समाज में भारी रोष पैदा कर दिया है। राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार और कायस्थ संगठनों ने एकजुट होकर मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा,
“एससी-एसटी एक्ट आज सवर्णों के लिए मौत का फंदा बन चुका है। कोई भी व्यक्ति निजी रंजिश निकालने के लिए इस कानून का दुरुपयोग कर रहा है। झारखंड में पिछले ५ सालों में सवर्णों पर 600 से ज्यादा फर्जी मुकदमे दर्ज हुए हैं, जिनमें से अधिकांश बाद में कोर्ट ने खारिज कर दिए। लेकिन तब तक परिवार बर्बाद हो चुका होता है।”ब्राह्मण समाज के नेता पंडित शशांक शेखर तिवारी ने कहा,
“हम दलितों के खिलाफ नहीं हैं। हम उस कानून के दुरुपयोग के खिलाफ हैं जो आज व्यक्तिगत बदले का हथियार बन चुका है। अगर कोई सवर्ण व्यक्ति गलती करता है तो उसे सजा मिलनी चाहिए, लेकिन बिना सबूत फर्जी मुकदमे ठोंककर पूरे परिवार को सड़क पर लाना कहां का न्याय है?”
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ अधिवक्ता और रांची हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस (रिटा.) डी.एन. उपाध्याय कहते हैं,
“सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही डॉ. सुब्रमण्यन स्वामी बनाम भारत संघ के मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे कि एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए और प्रारंभिक जांच जरूरी है। लेकिन झारखंड पुलिस आज भी राजनीतिक दबाव में बिना जांच गिरफ्तारी करती है। इसका सबसे ज्यादा शिकार सवर्ण और ओबीसी समुदाय हो रहा है।”उन्होंने आगे कहा,
“2024 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि अगर प्रथम दृष्टया जातिसूचक शब्द या अपमान का प्रमाण नहीं है तो केस दर्ज ही नहीं होना चाहिए। फिर भी जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा।”
आंकड़े चौंकाने वाले
झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार:
- राज्य में 2020 से 2024तक एससी-एसटी एक्ट के तहत कुल 11847 मुकदमे दर्ज हुए।
- इनमें से 68% मामले (लगभग 8000) चार्जशीट तक नहीं पहुंचे, यानी पुलिस ने भी पाया कि आरोप निराधार थे।
- 42% मामलों में कोर्ट ने एफआर (फाइनल रिपोर्ट) स्वीकार कर ली, यानी केस फर्जी पाए गए।
- सिर्फ 9% मामलों में ही दोषसिद्धि हुई।
यानी 91% मामलों में या तो केस फर्जी साबित हुए या सबूत के अभाव में बंद हो गए। फिर भी इन 91% परिवारों की जिंदगी तबाह हो चुकी होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार सिंह कहते हैं,
“झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल में एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग चरम पर है। इसका कारण है कि सत्ता में बैठे कई दलित और आदिवासी नेता इसे अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का हथियार मानते हैं। सवर्ण वोट तो वैसे भी इनके पास नहीं है, इसलिए वे बेधड़क इसका इस्तेमाल करते हैं।”
पीड़ित परिवार की गुहार
रंजीत सिंह ने मीडिया से कहा,
“हमने कभी मंत्री की जाति को लेकर एक शब्द नहीं बोला। सिर्फ उनके भ्रष्टाचार की बात की। उसके बदले हमारा पूरा परिवार बर्बाद कर दिया गया। मेरी मां की उम्र 70 साल है, फिर भी उन्हें बार-बार कोर्ट के चक्कर लगवाए जा रहे हैं। हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही। हम चाहते हैं कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी लोगों पर कार्रवाई हो।”
सवर्ण संगठनों ने ऐलान किया है कि अगर 15 दिसंबर तक इस मामले में निष्पक्ष जांच और मंत्री पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे रांची में विशाल प्रदर्शन करेंगे। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की भी तैयारी है जिसमें पूरे झारखंड में एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर रोक लगाने की मांग की जाएगी।एक सवाल पूरे राज्य में गूंज रहा है –
क्या एससी-एसटी एक्ट वाकई दलितों-आदिवासियों की ढाल है या अब यह कुछ लोगों के हाथ में निजी बदले की तलवार बन चुका है?
Source – Social Media
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Reliable media Desk 24/7

