गो वध जघन्य, याचिका खारिज
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि गोवध (गाय की हत्या) जैसे कृत्य समाज में “जीवन की सामान्य गति” को बाधित करते हैं और स्वतः ही हिंसक प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। कोर्ट ने इस आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को वैध ठहराया।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने यह निर्णय उस मामले में दिया, जिसमें आरोपी पर वर्ष 2025 में होली के आसपास जंगल में एक गाय और दो बछड़ों की हत्या का आरोप था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गाय की हत्या समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करती है, जिससे तीव्र भावनाएं भड़कती हैं और अक्सर व्यापक हिंसा की स्थिति पैदा हो जाती है। कोर्ट के अनुसार, ऐसे कृत्यों का प्रभाव केवल एक घटना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बड़े क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि कुछ मुद्दे इतने संवेदनशील होते हैं कि उनके सामने आते ही समाज में व्यापक उथल-पुथल मच सकती है और सामान्य जनजीवन प्रभावित हो सकता है। गोवध को इसी श्रेणी में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि यह कृत्य अक्सर बड़े पैमाने पर हिंसा और अशांति को जन्म देता है।
अदालत ने अपने फैसले में शौकत अली बनाम भारत संघ (2002) के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि गोहत्या सांप्रदायिक तनाव और वैमनस्य को बढ़ाती है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग होती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था का आकलन किसी व्यक्ति के इरादे से नहीं, बल्कि उसके कृत्य के प्रभाव से किया जाता है।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी माना कि यदि किसी बंद व्यक्ति के ज़मानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना हो और उसके दोबारा सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की आशंका हो, तो उसके खिलाफ निवारक हिरासत (Preventive Detention) का आदेश दिया जा सकता है। इस संदर्भ में कमरुननिसा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का भी उल्लेख किया गया।
अंततः अदालत ने याचिकाकर्ता की यह दलील भी खारिज कर दी कि उसकी हिरासत के खिलाफ दिए गए अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में देरी हुई। कोर्ट ने माना कि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का उल्लंघन नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को खारिज करते हुए NSA के तहत हिरासत को सही ठहराया।

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

