पत्नी कैंसर से पीड़ित, पति के सिर पर छत बचाने का संघर्ष: प्रयागराज के प्रदीप कुमार साहू की दर्दभरी दास्तान

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न्याय की आस में भटकता एक परिवार

उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर प्रयागराज (इलाहाबाद) एक बार फिर इंसानियत, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सुस्ती से जुड़े एक गंभीर मामले का गवाह बना है। यह कहानी केवल एक संपत्ति के विवाद की नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे पति की संघर्षगाथा है, जिसकी दुनिया एक तरफ उसकी जीवनसंगिनी की जानलेवा बीमारी (कैंसर) के आगे बिखर रही है, तो दूसरी तरफ उसकी अपनी ही छत को बचाने की जद्दोजहद में कानून के दरवाजे खटखटाते-खटखटाते थक चुकी है।

धूमनगंज थाना क्षेत्र के रहने वाले प्रदीप कुमार साहू की यह कहानी उन तमाम व्यवस्थागत कमजोरियों को उजागर करती है, जहां कानूनी रूप से संपत्ति खरीदने के बावजूद एक आम नागरिक को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब के नारद सभागार में आयोजित एक पत्रकार वार्ता के दौरान जब प्रदीप कुमार साहू ने अपनी आपबीती सुनाई, तो वहां मौजूद हर शख्स का दिल पसीज गया।

घटना की पृष्ठभूमि: बैंक नीलामी से मिला आशियाना

प्रदीप कुमार साहू की कहानी की शुरुआत वर्ष 2019 से होती है, जब उन्होंने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई और तमाम उम्मीदों के साथ एक बड़ा फैसला लिया। कानून और नियमों का पालन करते हुए, उन्होंने एक वित्तीय संस्थान (बैंक) की आधिकारिक नीलामी प्रक्रिया के तहत धूमनगंज क्षेत्र में स्थित एक मकान को खरीदा।

  • कानूनी प्रक्रिया का पालन: बैंक द्वारा निर्धारित सभी औपचारिकताओं, नीलामी की शर्तों और वित्तीय लेन-देन को पूरा करने के बाद, बैंक ने विधिवत रूप से उस मकान का कब्जा प्रदीप कुमार साहू को सौंप दिया था।
  • गृह प्रवेश और सामान्य जीवन: मकान का वैध कब्जा मिलने के बाद प्रदीप अपने परिवार के साथ उस घर में रहने लगे। उन्हें लगा कि अब उनके जीवन का एक बड़ा पड़ाव सुरक्षित हो गया है और उनका परिवार अपने आशियाने में सुकून से रह सकेगा।

किंतु, किसी को क्या पता था कि जिस घर को उन्होंने अपने सपनों का आशियाना बनाया था, वही घर आने वाले समय में उनके मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सबसे बड़ा केंद्र बन जाएगा।

नियति का कड़ा प्रहार: पत्नी की गंभीर बीमारी (कैंसर)

इंसान के जीवन में जब मुश्किलें आती हैं, तो अक्सर वे अकेली नहीं आतीं। प्रदीप कुमार साहू के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक तरफ जहाँ वे अपने नए मकान में जीवन को पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ उनके परिवार पर एक ऐसा वज्रपात हुआ, जिसने उनकी दुनिया हिला कर रख दी।

  • कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी की चपेट में पत्नी: प्रदीप की पत्नी घातक बीमारी कैंसर की गंभीर चपेट में आ गईं।
  • अस्पतालों के चक्कर और भागदौड़: कैंसर जैसी बीमारी के इलाज के लिए लंबे समय तक चलने वाली चिकित्सा प्रक्रिया, कीमोथेरेपी और विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। स्थानीय स्तर पर उचित इलाज न मिल पाने के कारण प्रदीप को अपनी बीमार पत्नी को लेकर प्रयागराज से बाहर के बड़े चिकित्सा संस्थानों और अस्पतालों में दौड़ना पड़ा।
  • असर और विवशता: पत्नी की जिंदगी बचाने की इस जंग में प्रदीप का पूरा ध्यान और उनकी अधिकांश पूंजी इलाज में खर्च होने लगी। उन्हें मजबूरन अपने घर से लंबे समय तक बाहर रहना पड़ा।

गैर-मौजूदगी का फायदा: घर पर दोबारा अवैध कब्जा

कहा जाता है कि लाचार व्यक्ति की कमजोरी का फायदा अक्सर समाज के असामाजिक तत्व उठाने की ताक में रहते हैं। जब प्रदीप कुमार साहू अपनी पत्नी के जीवन की रक्षा के लिए अस्पताल के चक्कर काट रहे थे, पीछे से उनके आशियाने को निशाना बना लिया गया।

  • मकान पर जबरन कब्जा: प्रदीप के अनुसार, उनकी और उनके परिवार की गैर-मौजूदगी का लाभ उठाते हुए कुछ दबंग और भू-माफिया किस्म के लोगों ने उनके मकान पर दोबारा जबरन कब्जा कर लिया।
  • लाखों का सामान क्षतिग्रस्त व गायब: आरोपियों ने सिर्फ घर पर कब्जा ही नहीं किया, बल्कि घर के अंदर रखे लगभग साढ़े चार लाख रुपये मूल्य के घरेलू सामान को या तो पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया या फिर उन्हें इधर-उधर कर चुरा ले गए।
  • उम्मीदों का आशियाना छिना: जब प्रदीप इलाज के बाद वापस लौटे, तो उन्होंने पाया कि उनका कानूनी रूप से खरीदा गया घर उनसे छीन लिया गया है और अंदर का सारा सामान गायब है।

थानों और चौकियों के चक्कर: पुलिसिया कार्रवाई और धमकियों का सिलसिला

अपने ही घर पर हुए इस अवैध कब्जे और लूटपाट के बाद प्रदीप कुमार साहू ने न्याय के लिए कानून का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तुरंत स्थानीय थाने (धूमनगंज थाना) में इस घटना की लिखित सूचना दी।

  • मुकदमा दर्ज, पर राहत नदारद: पुलिस ने शुरुआती जांच-पड़ताल के बाद इस मामले में मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर प्रदीप को कोई राहत नहीं मिली। कागजी कार्रवाई अपनी जगह चलती रही, जबकि हकीकत में उनका घर अब भी दबंगों के कब्जे में था।
  • डराने-धमकाने का खेल: न्याय मांगने की कीमत प्रदीप को धमकियों के रूप में चुकानी पड़ रही है। उनका आरोप है कि उन्हें लगातार अलग-अलग अज्ञात मोबाइल नंबरों से फोन कर के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जा रही हैं।
  • दोहरी मानसिक प्रताड़ना: एक तरफ कैंसर से जूझती पत्नी की मौत और जिंदगी के बीच की लड़ाई, और दूसरी तरफ अपराधियों द्वारा दी जा रही धमकियों का खौफ—प्रदीप इस समय दोहरी और असहनीय मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहे हैं।

नया मामला: 11 अक्टूबर की घटना और दुकानों के ताले तोड़ना

मामला यहीं शांत नहीं हुआ। प्रदीप कुमार साहू के अनुसार, दबंगों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे लगातार उनकी बची-खुची संपत्तियों को भी निशाना बना रहे हैं।

  • 11 अक्टूबर की वारदात: पीड़ित ने बताया कि बीते 11 अक्टूबर को उनके मकान के ठीक नीचे बनी दो बंद दुकानों के ताले जबरन तोड़ दिए गए।
  • दुकानों पर भी कब्जा: ये दोनों दुकानें कानूनी रूप से प्रदीप के ही कब्जे और अधिकार में थीं, लेकिन दबंगों ने उन्हें भी बलपूर्वक अपने अधिकार में ले लिया।
  • न्याय की गुहार: इस ताजा घटना के बाद प्रदीप ने स्थानीय पुलिस अधिकारियों और चौकी के अनगिनत चक्कर काटे, परंतु हर जगह उन्हें केवल कोरे आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।

पत्रकार वार्ता में छलका दर्द: “अब सिर्फ आश्वासन नहीं, न्याय चाहिए”

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क्लब के नारद सभागार में मीडिया के सामने अपनी व्यथा रखते हुए प्रदीप कुमार साहू की आँखें नम थीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा:

“मेरी पत्नी अस्पताल के बिस्तर पर मौत से लड़ रही है, और मैं अपने ही खरीदे हुए मकान को बचाने के लिए थानों की सीढ़ियां चढ़ रहा हूँ। बैंक की नीलामी से वैध तरीके से मकान खरीदने के बाद भी मुझे शरणार्थी जैसी जिंदगी जीने को मजबूर किया जा रहा है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है, लेकिन आरोपियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे खुलेआम घूम रहे हैं और मुझे धमकियां दे रहे हैं। अब मुझे सिर्फ दिलासा या आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस न्याय और मेरा मकान वापस चाहिए।”

उन्होंने मीडिया के माध्यम से प्रदेश के प्रशासनिक उच्चाधिकारियों, पुलिस कमिश्नर प्रयागराज और शासन से गुहार लगाई है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए।

इस प्रकरण के सामाजिक और कानूनी पहलू

प्रदीप कुमार साहू का यह मामला केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और न्याय प्रणाली के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर सवाल खड़े करता है:

  1. बैंक नीलामी की सुरक्षा और विश्वसनीयता: जब कोई नागरिक किसी अधिकृत बैंक से नीलामी के जरिए कोई संपत्ति खरीदता है, तो बैंक और प्रशासन की यह नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह उसे सुरक्षित और निर्विवाद कब्जा प्रदान करे। यदि नीलामी के वर्षों बाद भी खरीदार को इस तरह के कब्जों का सामना करना पड़े, तो लोग बैंकों की नीलामी पर भरोसा करना बंद कर देंगे।
  2. संवेदनशील मामलों में त्वरित पुलिस कार्रवाई: एक तरफ जहां सरकार महिलाओं और मरीजों की सुरक्षा के दावे करती है, वहीं कैंसर पीड़ित पत्नी के पति को इस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। पुलिस प्रशासन को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल प्रभाव से अवैध कब्जाधारियों को खदेड़ कर मकान मूल मालिक को सौंपना चाहिए।
  3. माफिया और दबंगई पर लगाम: उत्तर प्रदेश में भू-माफियाओं और अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति रही है। ऐसे में धूमनगंज क्षेत्र की यह घटना दर्शाती है कि कुछ स्थानीय स्तर पर सक्रिय अराजक तत्व अभी भी कानून की धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आ रहे हैं।

आगे की उम्मीद

प्रदीप कुमार साहू का संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि एक आम नागरिक जब सिस्टम के सामने अकेला पड़ जाता है, तो उसकी पीड़ा कितनी भयावह हो जाती है। उनकी पत्नी का कैंसर का इलाज और उनके सिर से छत छिन जाने का संकट—दोनों ही मोर्चों पर वे अकेले ही भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव झेल रहे हैं।

प्रयागराज की मीडिया और जागरूक नागरिकों के बीच इस मामले के आने के बाद अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन और पुलिस के उच्च अधिकारी इस मामले में कितनी जल्दी और कितनी सख्ती से कार्रवाई करते हैं। क्या प्रदीप को उनका आशियाना और दुकानें वापस मिलेंगी? क्या कैंसर से लड़ रही उनकी पत्नी को अंतिम समय में अपने घर की छत नसीब हो पाएगी? इन सवालों के जवाब अब पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन के त्वरित और निष्पक्ष एक्शन पर टिके हुए हैं।

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RMB News Desk

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