आरक्षण के नाम पर सवर्णों का धीमा नरसंहार: लाखों मेधावी छात्रों की टूटी उम्मीदें-Slow genocide of upper castes
नई दिल्ली/लखनऊ, 29 नवंबर 2025 Slow genocide of upper castes
“मेरा बेटा 98.7 परसेंटाइल लाया था NEET में। जनरल कैटेगरी में उसका ऑल इंडिया रैंक 3800 था। फिर भी एक भी सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं मिला।
जिस लड़के को सीट मिली, उसने 312 नंबर लाए थे – मतलब 52% से भी कम। आज मेरा बेटा राहुल 70 लाख रुपए सालाना फीस वाले प्राइवेट कॉलेज में पढ़ रहा है। गांव की आखिरी 22 बीघा जमीन बेच दी। अब कर्ज 1.10 करोड़ हो चुका है।”
ये शब्द हैं लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रहने वाले पूर्व फौजी रामेश्वर शर्मा के। उनकी आँखें नम हैं, आवाज काँप रही है।रही है।राहुल अकेला नहीं। देश के कोने-कोने से ऐसी लाखों कहानियाँ रोज सामने आ रही हैं। मेरिट में अव्वल आने वाले सवर्ण (जनरल कैटेगरी) बच्चे सरकारी मेडिकल, इंजीनियरिंग, IAS-IPS की सीटों से वंचित हो रहे हैं, जबकि 50% से ज्यादा सीटें आरक्षण के नाम पर चली जा रही हैं।
राहुल अकेला नहीं। देश के कोने-कोने से ऐसी लाखों कहानियाँ रोज सामने आ रही हैं। मेरिट में अव्वल आने वाले सवर्ण (जनरल कैटेगरी) बच्चे सरकारी मेडिकल, इंजीनियरिंग, IAS-IPS की सीटों से वंचित हो रहे हैं, जबकि 50% से ज्यादा सीटें आरक्षण के नाम पर चली जा रही हैं।
“देश को आजाद करवाया, आज खुद गुलाम हैं”
कानपुर देहात के एक गांव में रहने वाले रिटायर्ड आर्मी हवलदार सुरेश त्रिवेदी कहते हैं, “मेरे दादा जी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जेल गए थे। पिता जी 1965 की लड़ाई में लड़े। मैंने कारगिल में देश की रक्षा की। आज मेरा पोता NEET में 690 अंक लाया, फिर भी MBBS नहीं मिला। उधर पड़ोस के एक लड़के को 280 अंक पर AIIMS दिल्ली मिल गया। मैंने कहा, ‘दादाजी, हमने देश को आजाद करवाया, आज हम खुद गुलाम हो गए।’ उस दिन मैं चुप रहा, क्योंकि जवाब मेरे पास नहीं था।”
SC/ST एक्ट बना सवर्णों के लिए फाँसी का फंदा
आरक्षण का दर्द सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं। नौकरी और सामाजिक जीवन में भी सवर्ण परिवार प्रताड़ना झेल रहे हैं। आगरा में रहने वाले रवि शर्मा (38) पहले रेलवे में क्लर्क थे। एक दिन ऑफिस के चपरासी ने उनके साथ अभद्रता की। रवि ने सिर्फ इतना कहा, “ऐसे नहीं बोलते भाईसाहब।” बस, अगले दिन SC/ST एक्ट का केस। बिना जाँच, बिना सबूत, सीधे जेल। दो साल अदालत के चक्कर काटे। नौकरी गई, घर गिरवी रखना पड़ा। आज रवि ऑटो रिक्शा चलाते हैं। जब भी कोई पूछता है, “क्या हुआ सर?” तो बस मुस्कुराकर कहते हैं, “बस गलत जात में पैदा हो गया।”सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में SC/ST एक्ट में संशोधन कर पूर्व जांच अनिवार्य की थी, लेकिन संसद ने तुरंत कानून पास कर उसे फिर से सख्त बना दिया। नतीजा? पिछले 7 साल में SC/ST एक्ट के तहत 1.10 लाख से ज्यादा केस दर्ज हुए, जिनमें से 75% से ज्यादा केस या तो खारिज हुए या आरोपी बरी हुए। मगर तब तक सवर्ण परिवार की इज्जत, नौकरी, मान-सम्मान सब तबाह हो चुका होता है।
सवर्णों के वोट से कुर्सी, सवर्णों के गले पर छुरी
सबसे बड़ा सवाल सवर्ण समाज आज सरकार से पूछ रहा है – “हमारा दोष क्या है?”
2019 में नरेंद्र मोदी ने कहा था, “मेरे रहते आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता।”
2024 में अमित शाह ने धमकी दी, “जो आरक्षण छुएगा, उसे हम खत्म कर देंगे।”
राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान – सब मौन।लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (सेवानिवृत्त) डॉ। एसएन त्रिपाठी कहते हैं, “सवर्ण वोटर 18-22% है। भाजपा को 2014, 2019, 2024 में यूपी-बिहार-राजस्थान-मध्य प्रदेश में भारी वोट सवर्णों ने ही दिए। लेकिन आज सवर्ण सांसदों में से एक भी संसद में खड़ा होकर नहीं कहता कि हमारे समाज के बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, हमारे नौजवान विदेश भाग रहे हैं। क्यों? क्योंकि वोट बैंक दूसरों का है। सवर्ण तो बस ATM बनकर रह गए।”
विदेश भाग रहे हैं सवर्ण बच्चे
कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के दूतावासों के बाहर सबसे लंबी लाइन सवर्ण बच्चों की है।
दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान के डायरेक्टर बताते हैं, “पहले बच्चे IIT, AIIMS के लिए मेहनत करते थे। आज 60% से ज्यादा जनरल कैटेगरी के बच्चे GRE, IELTS, GMAT की तैयारी कर रहे हैं। माँ-बाप कहते हैं – ‘बेटा, यहाँ कुछ नहीं बचा तुम्हारे लिए। भाग जाओ।’”
अब बस बहुत हुआ Slow genocide of upper castes
सवर्ण समाज में अब गुस्सा फूट रहा है।
लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, जयपुर, भोपाल में “सवर्ण न्याय मोर्चा”, “जनरल कैटेगरी संघर्ष समिति” जैसे संगठन बन रहे हैं। व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर सैकड़ों ग्रुप सक्रिय हैं। लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं –
“जब तक हम चुप रहेंगे, तब तक लाठी भी खाएंगे, गाली भी सुनेंगे और अंत में ठोकर भी।”आगरा के एक युवा इंजीनियर ने सोशल मीडिया पर लिखा,
“हमारे पूर्वजों की गलती सुधार रहे हैं जो उन्होंने देश को आजाद करवाया। अब हमारा बच्चा विदेश में गुलाम बनेगा, ताकि यहाँ का सिस्टम खुश रहे।”
अंत में सिर्फ एक सवाल
जिस देश को हमारे बाप-दादाओं ने खून देकर आजाद कराया,
उसी देश में आज हमारी आने वाली पीढ़ी को “जनरल कैटेगरी” होने की सजा मिल रही है।
क्या यही है आजादी का मतलब?
क्या यही है संविधान की आत्मा?
क्या यही है “सबका साथ, सबका विकास”?या अब समय आ गया है कि सवर्ण समाज भी एकजुट होकर पूछे –
“हमारा हक कब?

अनिल शुक्ला स्पेशल करेस्पोंडेंस रिलाएबल मीडिया भारत बस्ती ,उत्तर प्रदेश है RMB में 10 वर्षो से रहकर पत्रकारिता कर रहे है।

