क्या सोशल मीडिया पर अनजाने में सवर्ण ही सांसद चंद्रशेखर की लोकप्रियता बढ़ा रहे हैं?
संपादकीय | रिलायबल मीडिया भारत
राजनीति में एक पुरानी कहावत है—जिसकी चर्चा होती है, उसकी मौजूदगी बनी रहती है। डिजिटल दौर ने इस कहावत को एक नया अर्थ दे दिया है। आज किसी राजनीतिक नेता को केवल उसके समर्थक ही चर्चा में नहीं रखते। उसके विरोधी, आलोचक और यहां तक कि उसके खिलाफ लगातार लिखने वाले लोग भी अनजाने में उसकी सार्वजनिक दृश्यता बढ़ा सकते हैं।
सांसद चंद्रशेखर आजाद की सोशल मीडिया उपस्थिति को इसी नजरिये से देखने की जरूरत है।
पिछले कुछ समय से फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर चंद्रशेखर आजाद को लेकर तीखी राजनीतिक बहस दिखाई देती है। उनकी किसी पोस्ट के समर्थन में टिप्पणियां आती हैं तो उसके नीचे विरोध और आलोचना भी दिखाई देती है। कई बार एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति केवल अपनी नाराजगी व्यक्त करना चाहता है, लेकिन उसके बाद शुरू हुई कमेंटबाजी उस पोस्ट को और अधिक चर्चा में ला सकती है।
यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—
क्या किसी नेता का विरोध करते-करते उसके विरोधी ही उसकी डिजिटल दृश्यता बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं?
इस सवाल को भावनाओं से नहीं, सोशल मीडिया के व्यवहार को समझकर देखना होगा।
नगीना की जीत ने बदली राजनीतिक तस्वीर
2024 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आजाद ने उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से 5,12,552 वोट प्राप्त करके जीत दर्ज की। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक परिणाम के अनुसार उन्होंने भाजपा के ओम कुमार को 1,51,473 मतों से पीछे छोड़ा।
यह चुनाव परिणाम अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करता कि उनकी लोकप्रियता कितनी बढ़ी या घटी, लेकिन यह जरूर बताता है कि वह राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में एक निर्वाचित सांसद के रूप में स्थापित हुए।
इसके बाद सोशल मीडिया उनकी राजनीतिक उपस्थिति का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है।
यहां एक सावधानी जरूरी है। सोशल मीडिया पर किसी नेता की चर्चा को सीधे जनसमर्थन नहीं कहा जा सकता। किसी पोस्ट पर हजारों कमेंट होना हजारों समर्थक होने का प्रमाण नहीं है। उसी तरह हजारों नकारात्मक कमेंट होना भी अपने आप में राजनीतिक कमजोरी का प्रमाण नहीं है।
लेकिन चर्चा का बढ़ना और दृश्यता का बढ़ना वास्तविक डिजिटल घटनाएं हैं।
विरोध का कमेंट आखिर करता क्या है?
मान लीजिए चंद्रशेखर आजाद कोई पोस्ट करते हैं। उनके समर्थक उसे पसंद करते हैं। कुछ लोग समर्थन में टिप्पणी करते हैं।
फिर विरोधी पक्ष का कोई व्यक्ति उस पोस्ट के नीचे जाकर लिखता है—“यह बात गलत है।”
दूसरा व्यक्ति उसका जवाब देता है।
तीसरा व्यक्ति पहले व्यक्ति से बहस करता है।
चौथा व्यक्ति उस बहस का स्क्रीनशॉट बनाकर अपनी प्रोफाइल पर डाल देता है।
अब वही मूल पोस्ट एक व्यक्ति के पेज से निकलकर कई दूसरे नेटवर्क में पहुंच जाती है।
यानी जिस व्यक्ति का उद्देश्य पोस्ट का विरोध करना था, वह अनजाने में उस पोस्ट की चर्चा का दायरा बढ़ा सकता है।
2026 में प्रकाशित एक प्रयोगात्मक अध्ययन में 1,370 प्रतिभागियों के साथ राजनीतिक चर्चाओं में reactions और replies के प्रभाव का परीक्षण किया गया। अध्ययन ने पाया कि replies बातचीत को गहरा कर सकते हैं, लेकिन चर्चा को कुछ सीमित threads में केंद्रित भी कर सकते हैं।
यह बात सोशल मीडिया की राजनीति को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
लोकप्रियता नहीं तो कम से कम दृश्यता जरूर?
यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है।
यदि किसी नेता की पोस्ट पर 10,000 प्रतिक्रियाएं आ गईं तो यह कहना गलत होगा कि नेता 10,000 लोगों में लोकप्रिय हो गया।
लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि उन 10,000 प्रतिक्रियाओं का कोई महत्व नहीं है।
क्योंकि वे प्रतिक्रियाएं उस सामग्री को राजनीतिक बातचीत में जीवित रखती हैं।
इसलिए लोकप्रियता और दृश्यता के बीच अंतर समझना जरूरी है।
लोकप्रियता का संबंध लोगों के समर्थन और स्वीकार्यता से हो सकता है, जबकि दृश्यता का संबंध इस बात से है कि किसी व्यक्ति या मुद्दे पर कितने लोग ध्यान दे रहे हैं।
किसी नेता के प्रति लोगों की राय नकारात्मक हो सकती है, लेकिन वह नेता फिर भी अत्यधिक चर्चित हो सकता है।
सोशल मीडिया इसी विरोधाभास पर चलता है।
विरोधी ही क्यों बना देते हैं नया प्रचार?
आज सोशल मीडिया पर कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक पोस्ट को केवल लाइक करके छोड़ सकता है। लेकिन यदि वह उसके जवाब में लंबी टिप्पणी लिखता है, दूसरे लोगों को टैग करता है, quote करता है या उस पर अलग पोस्ट बनाता है, तो वह उसी विषय को अपने नेटवर्क में ले जाता है।
एक राजनीतिक संचार अध्ययन में Facebook पर किए गए बड़े प्रयोगों के आधार पर पाया गया कि मुद्दा-केंद्रित राजनीतिक समाचारों में comments और reactions अधिक मिलने की प्रवृत्ति देखी गई।
इससे एक बात स्पष्ट होती है—
राजनीतिक विवाद स्वयं engagement पैदा कर सकता है।
और engagement सोशल मीडिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्रा बन चुका है।
सबसे बड़ा खतरा: बहस मुद्दे से हटकर व्यक्ति पर आ जाए
राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी नेता के बयान की आलोचना करने के बजाय बहस व्यक्ति, जाति, समुदाय और व्यक्तिगत आरोपों तक पहुंच जाती है।
ऐसी स्थिति में मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है।
नेता ने क्या कहा था?
उसका आधार क्या था?
उसने संसद में क्या किया?
उसके क्षेत्र में क्या काम हुआ?
उसकी नीतियों का प्रभाव क्या है?
इन सवालों की जगह बहस इस बात पर आ जाती है कि “कौन किसके साथ है?”
यही वह स्थिति है जहां सोशल मीडिया राजनीतिक विमर्श को मजबूत करने के बजाय ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है।
2022 के एक अध्ययन में पाया गया कि ऑनलाइन commenting जैसे व्यवहार कई बार लोगों की पहले से मौजूद राजनीतिक धारणाओं को और मजबूत कर सकते हैं।
अर्थात व्यक्ति बहस जीतने के लिए कम और अपनी पहले से बनी राय को मजबूत करने के लिए ज्यादा सक्रिय हो सकता है।
क्या आलोचना बंद कर देने से किसी नेता की लोकप्रियता गिर जाएगी?
यह निष्कर्ष भी सावधानी से देखना होगा।
यह कहना कि यदि किसी समूह ने कमेंट करना बंद कर दिया तो किसी नेता की लोकप्रियता निश्चित रूप से गिर जाएगी—इसका कोई सामान्य वैज्ञानिक आधार नहीं है।
किसी नेता का राजनीतिक प्रभाव कई चीजों से बनता है।
चुनाव परिणाम, संगठन, जमीनी कार्यकर्ता, जनसभाएं, स्थानीय मुद्दे, मीडिया कवरेज, सामाजिक समीकरण और व्यक्तिगत राजनीतिक छवि—इन सभी का योगदान हो सकता है।
इसलिए केवल Facebook या X की टिप्पणियों को किसी नेता की पूरी राजनीतिक ताकत मानना उतना ही गलत होगा जितना उन्हें पूरी तरह महत्वहीन मानना।
हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि लगातार डिजिटल बहस किसी राजनीतिक व्यक्ति को सार्वजनिक चर्चा से गायब नहीं होने देती।
डिजिटल राजनीति ने एक नया समीकरण बनाया है—
समर्थक नेता की पोस्ट को आगे बढ़ाता है।
विरोधी उसका विरोध करता है।
विरोध का जवाब आता है।
जवाब पर फिर प्रतिक्रिया होती है।
और पूरा विवाद हजारों लोगों की स्क्रीन तक पहुंच जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में मूल पोस्ट बार-बार सामने आती रहती है।
यही सोशल मीडिया का विरोधाभास है।
कभी-कभी कोई व्यक्ति जिस आवाज को दबाना चाहता है, उसी आवाज पर सबसे ज्यादा चर्चा करके उसे और ज्यादा लोगों तक पहुंचा देता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आलोचना नहीं होनी चाहिए।
बल्कि अर्थ यह है कि आलोचना किस तरीके से की जाए, यह महत्वपूर्ण है।
‘कमेंट करो’ नहीं, ‘सोचकर प्रतिक्रिया दो’
राजनीतिक बहस में सबसे जरूरी बात शायद यही है कि हर प्रतिक्रिया तत्काल प्रतिक्रिया न हो।
किसी पोस्ट को देखकर गुस्सा आया—कमेंट कर दिया।
किसी बयान से असहमति हुई—पोस्ट शेयर कर दी।
किसी टिप्पणी पर नाराजगी हुई—लंबी बहस शुरू कर दी।

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

