From Uninor to Owaisi : जब विकल्प पैदा होता है, तो लुटेरे फड़फड़ाने लगते हैं

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From Uninor to Owaisi 2004-2005 का दौर याद कीजिए। उस समय एक नई सिम लेना भी बड़ी बात होती थी। एयरसेल, एयरटेल, हच (बाद में वोडाफोन) या आइडिया की नई सिम की कीमत तीन-चार सौ रुपये से कम नहीं होती थी।

सिम लेने के बाद हर महीने उसे चालू रखने के लिए कम से कम दो सौ रुपये का रिचार्ज करवाना अनिवार्य था। आउटगोइंग कॉल की दरें आसमान छूती थीं – लोकल कॉल भी सवा दो रुपये प्रति मिनट से कम नहीं। अगर आप कॉल रेट थोड़ा कम करवाना चाहते थे तो उसके लिए अलग से तीस-पचास रुपये का “स्पेशल टैरिफ वाउचर” करवाना पड़ता था।

कुल मिलाकर हर महीने मोबाइल रखना मध्यम वर्ग के लिए भी महँगा सौदा था।फिर अचानक 2009 में नॉर्वे की कंपनी टेलीनॉर की सब्सिडियरी यूनिनॉर ने भारतीय बाजार में धमाकेदार एंट्री की। उसने जो ऑफर दिए, वो उस समय सपने जैसे लगते थे – नई सिम महज 49 रुपये में, लाइफटाइम वैलिडिटी, लाइफटाइम इनकमिंग फ्री और सबसे बड़ी बात – यूनिनॉर टू यूनिनॉर अनलिमिटेड कॉल फ्री, बाकी नेटवर्क पर भी 20 पैसे से 50 पैसे प्रति मिनट।

पहली बार भारत में किसी ने “डायनामिक प्राइसिंग” और “सेकंड बेस्ड बिलिंग” शुरू की। जनता पागल हो गई। लोग लाइन लगाकर यूनिनॉर की सिम लेने लगे।बाजार में हड़कंप मच गया। एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया जैसी दिग्गज कंपनियाँ रातों की नींद हराम हो गई। उनके शेयर गिरने लगे। फिर शुरू हुआ दो सिम वाला दौर। नोकिया, सैमसंग ने तुरंत डुअल-सिम फोन लॉन्च किए।

हर व्यक्ति के पास एक सिम पुरानी कंपनी की (इनकमिंग के लिए) और दूसरी सिम यूनिनॉर की (कॉलिंग के लिए) रहने लगी। यूनिनॉर ने महज दो-तीन साल में ४ करोड़ से ज्यादा ग्राहक जोड़ लिए।लेकिन लुटेरों की नींद कैसे पूरी होती? 2012 में खेल पलट गया। एयरटेल ने टेलीनॉर इंडिया (यूनिनॉर) को खरीद लिया। खरीदारी के बाद जो हुआ, वो सबके सामने है – लाइफटाइम इनकमिंग का कॉन्सेप्ट धीरे-धीरे खत्म, मिनिमम रिचार्ज फिर अनिवार्य, टैरिफ फिर से ऊपर।

आज जियो आने के बावजूद तीनों बड़ी कंपनियाँ (एयरटेल, वोडा-आइडिया, जियो) मिलकर टैरिफ तय करती हैं। उपभोक्ता के पास फिर से कोई विकल्प नहीं बचा।ठीक यही कहानी पिछले सत्तर साल से भारत की राजनीति में भी चल रही है। आजादी के बाद से एक खास कथित सेक्युलर गिरोह ने मुस्लिम समाज को अपना स्थायी वोट-बैंक बना रखा था।

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, तृणमूल, डीएमके – सबने एक ही फॉर्मूला अपनाया – मुसलमानों को वोट दो, वरना भाजपा आ जाएगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुनियादी सुविधाएँ – इन मुद्दों पर कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। सचिवालय, विश्वविद्यालय, पुलिस, न्यायपालिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व आज भी न के बराबर है।

हैदराबाद के पुराने शहर, मुरादाबाद, अलीगढ़, मेवात, सीमांचल, मालदा – इन इलाकों में आज भी बिजली-पानी-सड़क-स्कूल-हॉस्पिटल की हालत बदतर है। लेकिन वोट के समय यही पार्टियाँ आती थीं – “हिंदू खतरे में हैं, हमें वोट दो” का डर दिखाकर।मुसलिम समाज भी डर के साए में जीता रहा।

उसे कभी लगा ही नहीं कि उसके पास भी कोई विकल्प हो सकता है। जिस तरह 2009 से पहले लोग सोचते थे कि महँगे टैरिफ के अलावा कोई रास्ता नहीं, उसी तरह मुसलमान भी सोचते थे कि कांग्रेस-सपा-राजद के अलावा कोई विकल्प नहीं।

From Uninor to Owaisi ji

फिर आया ओवैसी का दौर – ठीक वैसे ही जैसे यूनिनॉर आया From Uninor to Owaisi

असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM ने मुस्लिम समाज को पहली बार एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प दिया। उन्होंने साफ कहा – हम डर की राजनीति नहीं, हक की राजनीति करेंगे। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सम्मान – ये मुद्दे उठाए गए। हैदराबाद में पुराने शहर का कायाकल्प, अस्पताल, स्कूल, विश्वविद्यालय – ये सब दिखने लगा। बिहार में किशनगंज, सीमांचल, महाराष्ट्र में औरंगाबाद, मालेगाँव, उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों पर AIMIM ने दिखा दिया कि मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी के पास नहीं है – वो बँट सकता है, वो सोच-समझकर वोट कर सकता है।

इससे कथित सेक्युलर गिरोह की नींद हराम हो गई। जिस तरह एयरटेल-वोडाफोन ने यूनिनॉर को खरीद लिया था, उसी तरह ये पार्टियाँ अब ओवैसी को खत्म करने की पूरी कोशिश कर रही हैं। कभी उनपर “भाजपा की बी-टीम” का आरोप, कभी फतवे, कभी सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलवाना, कभी गठबंधन से बाहर रखना। लेकिन जनता समझ चुकी है।

जिस तरह यूनिनॉर के आने से लोगों को एहसास हुआ था कि सस्ती कॉल भी मुमकिन है, उसी तरह ओवैसी के आने से मुस्लिम समाज को एहसास हुआ कि बिना डर के, बिना गुलामी के भी राजनीति की जा सकती है।

आज ओवैसी जहाँ भी जा रहे हैं – महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल – वहाँ मुस्लिम युवा, महिलाएँ, बुद्धिजीवी खुलकर साथ आ रहे हैं। क्योंकि पहली बार उन्हें लगा कि उनका वोट सिर्फ डर के कारण नहीं, बल्कि उम्मीद के कारण भी डाला जा सकता है।यूनिनॉर को भले ही मार्केट से हटा दिया गया, लेकिन उसने जो बीज बोया – सस्ती कॉल, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता का अधिकार – उसकी गूँज आज भी जियो के रूप में सुनाई देती है।

ठीक वही ओवैसी कर रहे हैं। भले ही कथित सेक्युलर गिरोह उन्हें अभी दबाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन जिस दिन मुस्लिम समाज पूरी तरह जागेगा, उस दिन ये सत्तर साल पुराना वोट-बैंक का खेल हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।जैसे उपभोक्ता ने एक बार सस्ती कॉल का स्वाद चख लिया तो फिर महँगे टैरिफ को स्वीकार नहीं किया, वैसे ही मुस्लिम समाज ने एक बार स्वाभिमान और विकल्प का स्वाद चख लिया है – अब वो डर के साये में जीने को तैयार नहीं।यूनिनॉर चला गया, लेकिन उसने टेलीकॉम क्रांति की नींव रखी।


ओवैसी शायद एक दिन राजनीति से हट भी जाएँ, लेकिन उन्होंने जो राजनीतिक जागृति पैदा की है, वो अब रुकने वाली नहीं।यह विकल्प की जीत है।
और विकल्प जब पैदा होता है, तो लुटेरे हमेशा फड़फड़ाते हैं।

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Rakesh Pandey

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।