प्रतापगढ़ में अधिवक्ता हत्याकांड: भूमि विवाद की आग में जल गई एक वरिष्ठ वकील की जिंदगी Advocate dies in Pratapgarh

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लालगंज (प्रतापगढ़), 6 नवंबर 2025: Advocate dies in Pratapgarh उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के लालगंज तहसील में एक सनसनीखेज हत्याकांड ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। 71 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता रुद्र प्रताप पांडेय की सोमवार रात लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया चिकित्सा संस्थान में इलाज के दौरान हुई मौत ने न केवल उनके परिवार को शोक की चादर ओढ़ा दी, बल्कि पूरे अधिवक्ता समाज को आक्रोश से भर दिया। 22 अक्टूबर को बवरिया गांव में भूमि विवाद के चलते पड़ोसियों द्वारा उनके पूरे परिवार पर किए गए कातिलाना हमले में रुद्र प्रताप समेत चार सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 13 दिनों तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद अंततः वे हार गए। मंगलवार को लखनऊ से शव लाने पर अधिवक्ताओं ने तहसील से जौनपुर-रायबरेली हाईवे तक प्रदर्शन किया, पुलिस और प्रशासन के खिलाफ तीखे नारे लगाए तथा मृतक के स्वजन को 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की। पुलिस ने फरार आरोपियों पर 50-50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया है, जबकि बुधवार को मुख्य आरोपी देवदत्त शुक्ल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। यह घटना न केवल भूमि विवादों की कड़वी सच्चाई उजागर करती है, बल्कि अधिवक्ताओं की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर रही है।

भूमि विवाद की जड़ें: पुरानी रंजिश ने लिया खौफनाक रूप

प्रतापगढ़ जिला, जो प्रयागराज मंडल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लंबे समय से भूमि विवादों का शिकार रहा है। यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है, और जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को लेकर पड़ोसियों के बीच झगड़े आम हैं। लेकिन बवरिया गांव का यह मामला इससे कहीं अधिक गंभीर साबित हुआ। गांव के निवासी रुद्र प्रताप पांडेय एक सम्मानित अधिवक्ता थे, जिन्होंने दशकों तक लालगंज तहसील की दीवानी अदालत में न्याय की लड़ाई लड़ी। वे न केवल कानूनी जगत के स्तंभ थे, बल्कि सामाजिक रूप से भी सक्रिय व्यक्ति थे। उनके परिवार में तीन पीढ़ियां अधिवक्ता हैं, जो इस घटना को और भी दर्दनाक बनाती है।22 अक्टूबर की दोपहर, जब सूरज अपने पूरे जोर पर चमक रहा था, बवरिया गांव में एक छोटे से भूमि विवाद ने हिंसक रूप धारण कर लिया। रुद्र प्रताप पांडेय अपने पुत्र बाल कृष्ण पांडेय (अधिवक्ता और भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष), भतीजे अभिषेक पांडेय (जिला मुख्यालय के अधिवक्ता) तथा भाई भानु प्रताप पांडेय के साथ अपनी जमीन का मुआयना कर रहे थे। तभी पड़ोसी परिवार के सदस्यों ने उन पर अचानक हमला बोल दिया। लाठियां, फरसे और अन्य हथियारों से लैस हमलावरों ने परिवार के चारों सदस्यों को जमकर पीटा। गवाहों के अनुसार, हमला इतना क्रूर था कि खून की नदियां बहने लगीं। स्थानीय ग्रामीणों ने किसी तरह घायलों को बचाया और उन्हें सीएचसी लालगंज ले जाया गया। वहां प्राथमिक उपचार के बाद सभी को लखनऊ रेफर कर दिया गया।अभिषेक पांडेय ने घटना के तुरंत बाद सांगीपुर थाने में तहरीर दर्ज कराई, जिसमें हत्या के प्रयास (धारा 307 आईपीसी), आपराधिक साजिश (धारा 120बी) तथा अन्य संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। नामजद आरोपी थे: कमल नारायण पांडेय (गांव का प्रभावशाली व्यक्ति), देवदत्त शुक्ल (भाजपा नेता और प्रधान प्रतिनिधि), आदित्य पांडेय उर्फ शनि उर्फ प्रभाकर (25 हजार रुपये का इनामी), सौरभ दत्त शुक्ल, विपिन कुमार शुक्ल तथा सच्चिदानंद पांडेय। इनमें से देवदत्त शुक्ल को मुख्य सूत्रधार माना जा रहा है, क्योंकि भूमि विवाद में उनकी भूमिका केंद्रीय थी। पुलिस जांच के अनुसार, यह विवाद वर्षों पुराना था, जो एक छोटी सी नाली के निर्माण को लेकर शुरू हुआ था। लेकिन राजनीतिक प्रभाव और जातीय रंजिश ने इसे हिंसक बना दिया।

मौत की दर्दनाक खबर: परिवार में मचा कोहराम

सोमवार रात करीब 11 बजे, जब लखनऊ अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा पसर गया था, रुद्र प्रताप पांडेय ने अंतिम सांस ली। डॉक्टरों के अनुसार, हमले में लगी चोटें इतनी गहरी थीं कि मल्टीपल ऑर्गन फेलियर हो गया। खबर बवरिया गांव पहुंचते ही परिवार टूट गया। पत्नी की चीखें आकाश छूने लगीं। पुत्र बाल कृष्ण, जो खुद गंभीर रूप से घायल हैं और अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं, को यह खबर देने पर सदमा लग गया। भाई भानु प्रताप पांडेय, जो हमले में सिर पर गंभीर चोटें झेल चुके थे, शव देखते ही बेहोश हो गए। भाई शिव प्रताप पांडेय भी दहाड़ मार-मारकर रो पड़े। मंगलवार सुबह करीब 11:15 बजे एंबुलेंस से शव लालगंज तहसील पहुंचा, जहां सैकड़ों अधिवक्ता इंतजार कर रहे थे। उन्होंने फूलमालाओं से शव को नमन किया और अंतिम विदाई दी। शव को प्रयागराज के दशाश्वमेध घाट ले जाया गया, जहां बुधवार को अंतिम संस्कार किया गया। हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे, जिनमें राजनीतिक हस्तियां भी शामिल थीं।परिवार के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “रुद्र चाचा हमारे परिवार के मुखिया थे। वे न केवल वकील थे, बल्कि गांव के लिए मार्गदर्शक भी। इस हमले ने हमें बर्बाद कर दिया। हम न्याय चाहते हैं, लेकिन डर लगता है कि आरोपी बचे हुए लोग हमें निशाना न बना दें।” यह दर्द न केवल पांडेय परिवार का है, बल्कि पूरे अधिवक्ता वर्ग का भी।

अधिवक्ताओं का उफान: हाईवे जाम, नोकझोंक और बहिष्कार

मंगलवार सुबह मौत की खबर तहसील पहुंची तो आक्रोश की लहर दौड़ गई। संयुक्त अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष अनिल त्रिपाठी महेश, उपाध्यक्ष आशीष तिवारी तथा महामंत्री हरिश्चंद्र पांडेय की अगुवाई में सैकड़ों अधिवक्ताओं ने बैठक बुलाई। उन्होंने न्यायिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार घोषित कर दिया। तहसील गेट को लोहे की जंजीरों से बंद कर दिया गया, और जत्था जौनपुर-रायबरेली हाईवे पर उतर आया। “पुलिस फेल, न्याय चोर!”, “अधिवक्ता हत्या, सरकार सो रही!” जैसे नारे गूंजने लगे। हाईवे जाम होने से वाहनों की लंबी कतारें लग गईं, और ट्रैफिक पुलिस को रूट डायवर्जन करना पड़ा।प्रदर्शन की सूचना पर अपर पुलिस अधीक्षक (पश्चिमी) बृजनंदन राय, सीओ आशुतोष मिश्र, लालगंज कोतवाल आलोक कुमार तथा सांगीपुर एसओ मनीष त्रिपाठी फोर्स लेकर पहुंचे। लेकिन अधिवक्ताओं का गुस्सा इतना भड़का था कि सीओ और कोतवाल से नोकझोंक हो गई। वकीलों ने उन्हें बैरंग लौटा दिया। यहां तक कि एसडीएम शैलेंद्र वर्मा भी आश्वासन देने पहुंचे, लेकिन उन्हें भी तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। युवा अधिवक्ताओं ने शव वाहन को घेर लिया और गांव जाने नहीं दिया, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ताओं के समझाने पर मामला शांत हुआ। अन्य सक्रिय अधिवक्ताओं में संतोष पांडेय, शैलेंद्र सिंह बघेल, राजेश तिवारी, धीरेंद्र शुक्ल, सूर्यकांत निराला, राकेश सिंह, राजेश दुबे तथा टीपी यादव शामिल रहे।आल इंडिया रूरल बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्ञान प्रकाश शुक्ल ने कहा, “यह पहली घटना नहीं है जब अधिवक्ता पर हमला हुआ। सांगीपुर पुलिस की लापरवाही ने इस हत्याकांड को जन्म दिया। यदि शेष आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई तो आंदोलन पूरे मंडल में फैला देंगे।” पूर्व अध्यक्ष देवी प्रसाद मिश्र ने भी पुलिस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। जूनियर बार एसोसिएशन ने अलग से शोक सभा बुलाई, जिसमें अन्य आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की गई।

पुलिस की कार्रवाई: गिरफ्तारियां तेज, लेकिन सवाल बाकी

पुलिस ने घटना के बाद त्वरित कार्रवाई शुरू की। 23 अक्टूबर को मुख्य आरोपी कमल नारायण पांडेय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। मंगलवार सुबह सांगीपुर पुलिस ने लखहरा तिराहा से 25 हजार रुपये के इनामी आदित्य पांडेय उर्फ सनी उर्फ प्रभाकर को धर दबोचा। बुधवार सुबह एक और बड़ी सफलता हाथ लगी, जब स्वाट टीम और सांगीपुर पुलिस ने सिंहनी पुल के पास से 50 हजार रुपये के इनामी देवदत्त शुक्ल को गिरफ्तार किया। देवदत्त, जो प्रधान प्रतिनिधि और भाजपा नेता हैं, पर पहले 25 हजार का इनाम था, जिसे एसपी दीपक भूकर ने दोगुना कर दिया था। सीओ आशुतोष मिश्र ने बताया, “हत्या के मामले में फरार आरोपियों पर 50 हजार का इनाम घोषित है। तीन टीमें दबिश दे रही हैं, एसटीएफ भी जुटी हुई है। शीघ्र सभी को जेल भेजेंगे। किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”शेष फरारों—सौरभ दत्त शुक्ल, विपिन कुमार शुक्ल तथा सच्चिदानंद पांडेय—की तलाश में पुलिस सक्रिय है। गांव में भारी फोर्स तैनात है, और पीएसी की टुकड़ियां तनाव कम करने में जुटी हैं। लेकिन अधिवक्ता समाज पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं। वे गैंगस्टर एक्ट लगाने और फास्ट ट्रैक ट्रायल की मांग कर रहे हैं।

राजनीतिक रंग: भाजपा एमएलसी का रिश्ता, विपक्ष की चुप्पी Advocate dies in Pratapgarh

यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। रुद्र प्रताप पांडेय भाजपा एमएलसी उमेश द्विवेदी की बहन के ससुर थे। उमेश द्विवेदी ने स्वयं शव को कंधा दिया और अधिवक्ताओं को आश्वासन दिया कि मांग पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचेगा। भाजपा जिलाध्यक्ष आशीष श्रीवास्तव, किसान मोर्चा के काशी तिवारी तथा अन्य नेता भी पहुंचे। कांग्रेस चेयरमैन अनीत संतोष द्विवेदी ने भी शोक व्यक्त किया। लेकिन विपक्षी दलों की ओर से कोई बड़ा बयान नहीं आया, जिससे सवाल उठ रहे हैं।मुख्यमंत्री को संबोधित मांग पत्र में अधिवक्ताओं ने 50 लाख रुपये मुआवजा, दो शस्त्र लाइसेंस, एक सरकारी नौकरी तथा सभी आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट की मांग की। उमेश द्विवेदी ने कहा, “यह परिवार हमारा अपना है। न्याय मिलेगा, चाहे कितना भी समय लगे।”व्यापक संदर्भ: अधिवक्ताओं पर बढ़ते हमले, न्याय व्यवस्था का संकटउत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं पर हमले कोई नई बात नहीं।

हाल के वर्षों में प्रयागराज, वाराणसी और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जहां वकीलों को क्लाइंट विवादों में निशाना बनाया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में यूपी में वकीलों के खिलाफ 150 से अधिक मामले दर्ज हुए। यह घटना न्याय व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। अधिवक्ता समाज का मानना है कि पुलिस की सुस्ती और राजनीतिक दबाव इन अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि विवादों को सुलझाने के लिए वैकल्पिक विवाद निपटान (एडीआर) तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है।प्रतापगढ़ एसपी दीपक भूकर ने कहा, “हम अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए विशेष दिशानिर्देश जारी करेंगे। इस मामले में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी।” लेकिन अधिवक्ता संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि न्याय नहीं मिला तो राज्यव्यापी हड़ताल होगी।

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RMB News Desk

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