आरक्षण: एक अभिशाप ऐतिहासिक जड़ें: ब्रिटिश ‘बांटो और राज करो’ की देन – Reservation A curse

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Reservation A curse आरक्षण की कहानी भारत के विभाजनकारी इतिहास से जुड़ी हुई है। 1909 का मॉर्ले-मिंटो सुधार और 1919 का मॉंटेग्यू-चेल्सफोर्ड एक्ट ने ‘सिपरेट इलेक्टोरेट’ की नींव रखी, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद का ‘डिवाइड एंड रूल’ सिद्धांत था। इसका उद्देश्य हिंदू समाज को जाति-आधारित खंडों में बांटना था।

मुसलमानों को अलग वोटिंग का अधिकार मिला, फिर दलितों (तत्कालीन डिप्रेस्ड क्लासेस) को। डॉ. बी.आर. आंबेडकर, जिन्हें कुछ इतिहासकार ब्रिटिश नीतियों के समर्थक मानते हैं, ने पूना पैक्ट (1932) के माध्यम से इस व्यवस्था को मजबूत किया। जन्म: पाकिस्तान का और आरक्षण का एक ही गर्भाशय—सिपरेट इलेक्टरेट। दोनों का डीएनए विभाजनकारी था। पाकिस्तान बना, तो आरक्षण आज भी समाज को खंडित कर रहा है।

यह नीति ब्रिटिशों की चालाकी थी। 1750 में भारत की जीडीपी विश्व की 23% थी (एंगस मैडिसन के आंकड़े), लेकिन 1947 में घटकर मात्र 3.8% रह गई। 45 ट्रिलियन डॉलर की लूट (उषा पाटेल की ‘टाइमलेस थेफ्ट’) का जिम्मेदार कौन? ईसाई लुटेरे।

उन्होंने भारत के उत्पादकों—मुख्यतः शूद्र वर्ग को—लूटा। ब्राह्मण पुजारी, क्षत्रिय योद्धा, वैश्य व्यापारी थे, लेकिन विशाल जीडीपी का निर्माण शूद्रों ने किया—कृषि, हस्तशिल्प, व्यापारिक श्रम से। लूट ने इन्हें दरिद्र बनाया, न कि ब्राह्मणवाद ने। आंबेडकर ने खुद वर्णव्यवस्था को मान्यता दी, लेकिन आरक्षण को हथियार बनाया। परिणाम? समाज का विघटन।

लालकृष्ण आडवाणी ने विल ड्यूरेंट की ‘द केस फॉर इंडिया’ का हवाला देते हुए कहा: “ब्रिटिश शासन ने भारत को आर्थिक रूप से नष्ट किया।” भाजपा की वेबसाइट पर यह पढ़ें। लेकिन संघी विद्वान इस लूट का जातिगत विश्लेषण क्यों नहीं करते? क्योंकि वोट की राजनीति में सच्चाई दफन हो जाती है। आरक्षण इसी लूट का परिणाम है, लेकिन अब यह अभिशाप बन चुका है—समाज को बांटता, योग्यता को कुचलता।

आर्थिक विनाश: शूद्रों का पतन और आरक्षण का बहाना

भारत की प्राचीन समृद्धि शूद्रों की मेहनत से थी। मनुस्मृति के अनुसार, शूद्र सेवा और श्रम के वर्ण थे। वे खेत जोतते, बुनते, लोहा गढ़ते थे। मुगलों के समय भी भारत विश्व व्यापार का केंद्र था। लेकिन ब्रिटिश आए, तो डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन शुरू। बंगाल का कपड़ा उद्योग नष्ट, लाखों कारीगर बेरोजगार। 1943 का बंगाल अकाल—30 लाख मौतें—शूद्र किसानों की भुखमरी से। लूट का स्वरूप? कच्चा माल सस्ता लेना, तैयार माल महंगा बेचना। भारत का सोना लंदन गया।

इसके बाद स्वतंत्र भारत में आरक्षण आया। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) ने इसे वैध बनाया। लेकिन क्या यह न्याय था? 1950 से आज तक 75% सरकारी नौकरियाँ आरक्षित। परिणाम: मेरिट का ह्रास। 2023 के यूपीएससी में जीएसटीआर 1.3 गुना अधिक कटऑफ सामान्य वर्ग के लिए। IITs में ओबीसी/SC/ST कोटा से योग्य अभ्यर्थी बाहर। एक अध्ययन (IIM बैंगलोर, 2022) कहता है कि आरक्षण से उत्पादकता 20-30% घटी।

शूद्र/दलित दरिद्र क्यों बने? ब्रिटिश लूट से। ब्राह्मणवाद ने तो वेद-उपनिषद लिखे, जो ज्ञान का भंडार हैं। ईसाई मिशनरियों ने दलितों को ईसाई बनाया, लेकिन आरक्षण ने उन्हें सरकारी नौकरियों में बांध दिया। आज 50% आरक्षित सीटें खाली रहती हैं (RTI डेटा, 2023)। बेरोजगारी 8% (CMIE), लेकिन आरक्षण से नौकरियाँ नहीं बढ़ीं—बल्कि भ्रष्टाचार बढ़ा।

सामाजिक विघटन: जाति-युद्ध का बीज Reservation A curse

आरक्षण ने हिंदू समाज को तोड़ा। 1990 का मंडल कमीशन—27% ओबीसी आरक्षण—ने सड़कों पर आग लगाई। आत्मदाह, दंगे। आज भी जाति-आधारित हिंसा: हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन (2016)—30 मौतें। बिहार में EWS vs OBC। आरक्षण वोटबैंक है। सपा-बसपा, RJD—सब जाति पर। 2019 चुनाव में 40% वोट जाति से प्रभावित (CVoter)।

आंबेडकर ब्रिटिश पिछलग्गू थे? हाँ, उन्होंने राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में सिपरेट इलेक्टरेट मांगा। गांधी ने पूना पैक्ट से रोका, लेकिन बीज बो दिया। आज आरक्षण उसी का विस्तार। महिलाओं का 33% आरक्षण बिल लटका, लेकिन जाति वाला चलेगा। क्यों? वोट।

आर्थिक अभिशाप: विकास का दुश्मन

जीडीपी प्रभाव बच्चे जानते हैं। लेकिन आरक्षण ने भारत को ‘जॉबलेस ग्रोथ’ दिया। 1991 उदारीकरण से GDP 6% बढ़ी, लेकिन सरकारी नौकरियाँ सिर्फ 2%। प्राइवेट सेक्टर आरक्षण से मुक्त, इसलिए भागा। विश्व बैंक (2023): भारत में स्किल गैप 40%। आरक्षण से अयोग्य अधिकारी—रेल हादसे, पुल ढहना। कोविड में PPE किट घोटाले।

45 ट्रिलियन लूट का प्रभाव? हिंदू समाज पर: शूद्र बेरोजगार। लेकिन आरक्षण ने इन्हें ‘क्रिमी लेयर’ बनाया—दूसरी पीढ़ी अमीर, लेकिन गरीबों को कुछ नहीं। NSSO (2019): SC/ST गरीबी 30%, लेकिन आरक्षण लाभ 10% परिवारों को। अभिशाप क्योंकि यह गरीबी मिटाने के बजाय जाति को अमर रखता है।

राजनीतिक दलदल: सच्चाई दफन

मोदी सरकार लूट की बात करती, लेकिन विश्लेषण नहीं। आडवाणी का कमेंट डिकोड करें: ब्रिटिश ने अर्थव्यवस्था लूटी, समाज बांटा। संघ को चाहिए ‘एकात्म मानववाद’, लेकिन आरक्षण से जातिवाद बढ़ा। वोट की दलदल में BJP भी फंसी। 2024 चुनाव: जाति सर्वे, उपचुनाव। साहस कहाँ?

समाधान: आरक्षण का अंत, विकास का मार्ग

आरक्षण अभिशाप है क्योंकि यह मेरिट मारता, एकता तोड़ता, विकास रोकता। विकल्प?

  • आर्थिक आधारित सहायता: गरीबी रेखा पर सबको, जाति न देखें। तमिलनाडु मॉडल—50% आरक्षण, लेकिन प्रगति कम।
  • शिक्षा क्रांति: EWS जैसा, लेकिन पूर्ण मेरिट।
  • स्किल इंडिया: 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग, न कि कोटा।
  • संविधान संशोधन: 50% कैप हटाओ, लेकिन मेरिट लाओ। सुप्रीम कोर्ट (इंदिरा साहनी, 1992) ने चेतावनी दी।

आंबेडकर ने कहा: “राजनीतिक लोकतंत्र काफी नहीं, आर्थिक लोकतंत्र चाहिए।” आरक्षण आर्थिक नहीं, जातिगत है। इसे खत्म करो, तो भारत फिर 23% GDP की ओर। शूद्र फिर निर्माता बनेगा—मेरिट से।

Rakesh Pandey

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।