19 वर्षीय युवा ब्रह्मचारी ने रचा इतिहास: 50 दिनों तक निरंतर ‘दण्डकर्म पारायण’ पूर्ण – Celibate Devvrat Mahesh Rekhe
वाराणसी, 2 दिसंबर 2025
काशी विश्वनाथ की नगरी एक बार फिर अपनी वैदिक गौरव गाथा को नई ऊँचाई प्रदान करने वाली साक्षी बनी है। मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में ब्रह्मचारी देवव्रत महेश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के अत्यंत दुर्लभ एवं कठिन ‘दण्डकर्म पारायण’ को 50 दिनों तक बिना एक क्षण का भी अवकाश लिए निरंतर पूर्ण कर एक अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है।
इस पारायण में लगभग 2000 मंत्रों का उच्चारण शामिल है, जिनमें अनेक जटिल दण्डक छंद, लघु-दीर्घ प्लुत सहित अत्यंत सूक्ष्म स्वर-व्यंजन नियमों का पालन अनिवार्य होता है।काशी से सांसद एवं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है।
उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूर्ण किया है।
इसमें अनेक वैदिक ऋचाएं और पवित्रतम शब्द उल्लेखित हैं, जिन्हें उन्होंने पूर्ण शुद्धता के साथ उच्चारित किया। ये उपलब्धि हमारी गुरु परंपरा का सबसे उत्तम रूप है। काशी से सांसद के रूप में, मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी यह अद्भुत साधना इसी पवित्र धरती पर संपन्न हुई। उनके परिवार, संतों, मुनियों, विद्वानों और देशभर की उन सभी संस्थाओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने इस तपस्या में उन्हें सहयोग दिया।
”दण्डकर्म पारायण की यह साधना वैदिक साहित्य में सर्वाधिक कठिन तपस्याओं में से एक मानी जाती है। इसमें प्रतिदिन लगभग १२-१४ घंटे तक एक ही आसन में बैठकर, बिना जल ग्रहण किए, बिना किसी विक्षेप के मंत्रों का उच्चारण करना होता है।
स्वर की सूक्ष्मता, लय, मात्रा और उच्चारण की शुद्धता में तनिक भी त्रुटि होने पर संपूर्ण संकल्प भंग हो जाता है। इतनी कम आयु में इस पारायण को पूर्ण करना आज के युग में अत्यंत दुर्लभ है। पिछले कई दशकों में देश में गिनती के ही विद्वान इस साधना को सफलतापूर्वक संपन्न कर पाए हैं।ब्रह्मचारी देवव्रत महेश रेखे का जन्म महाराष्ट्र के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें वेदों के प्रति अगाध श्रद्धा थी।
मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने वेदारंभ किया और 12 वर्ष की आयु तक सम्पूर्ण शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा कंठस्थ कर ली थी। इसके पश्चात् उन्होंने काशी में आचार्य पंडित श्रीकृष्ण शर्मा जी एवं पंडित वागीश शास्त्री जी के सान्निध्य में घोर तपस्या प्रारंभ की।
पिछले पाँच वर्षों से वे काशी में ही निवास कर रहे हैं और निरंतर वैदिक साधना में लीन हैं।इस 50 दिवसीय अनुष्ठान के दौरान देवव्रत जी ने एकांत कक्ष में रहकर केवल फलाहार तक त्याग दिया था। प्रतिदिन प्रातः 3 बजे से रात्रि 9 बजे तक एक ही आसन में बैठकर मंत्रोच्चार करते रहे। उनके गुरु पंडित वागीश शास्त्री जी ने बताया, “इतैंतीस वर्षों के अपने अध्यापन जीवन में मैंने इतनी कम आयु में इतनी कठोर साधना करते हुए पहली बार किसी को देखा है।
देवव्रत में अद्भुत एकाग्रता और वैदिक ध्वनि के प्रति स्वाभाविक लगाव है। यह काशी की गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत प्रमाण है।”इस उपलब्धि की खबर जैसे ही सोशल मीडिया एवं वैदिक समुदाय में फैली, देश-विदेश के अनेक संतों, विद्वानों ने बधाई संदेश भेजे।
काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष आचार्य रामयत्न शुक्ल ने कहा, “आज के भौतिकतावादी युग में जब युवा पीढ़ी वैदिक ज्ञान से दूर होती जा रही है, ऐसे युवा ब्रह्मचारी हमारी संस्कृति के प्रदीप्त दीपक हैं। देवव्रत जी ने सिद्ध कर दिया कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो कोई भी साधना असंभव नहीं।
”वाराणसी के संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र जी ने कहा, “काशी वह पावन भूमि है जहाँ आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी करपात्री जी तक अनेक महापुरुषों ने वैदिक साधना की है। आज फिर एक १९ वर्षीय बालक ने इस परंपरा को नई चमक दी है। यह हम सबके लिए गर्व की बात है।
”देवव्रत जी के पिता श्री महेश रेखे ने बताया, “हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हमारा पुत्र इतनी बड़ी साधना करेगा। यह सब गुरुओं की कृपा और काशी की पवित्रता का प्रताप है।”
उनकी माता श्रीमती सुलभा रेखे की आँखों में आँसू हैं, “बचपन से ही वह रात-दिन वेद पढ़ता था। कभी खेलने नहीं जाता था। आज उसकी यह सफलता देखकर लगता है कि उसकी तपस्या सार्थक हुई।
”इस अवसर पर काशी के कई वैदिक संस्थानों ने देवव्रत जी को सम्मानित करने की घोषणा की है। भारतीय विद्या भवन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वेद विभाग तथा संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने उन्हें विशेष आमंत्रण देकर व्याख्यान के लिए बुलाया है।
साथ ही महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश की कई वैदिक संस्थाएँ उन्हें स्वर्ण पदक एवं शॉल प्रदान करने वाली हैं।
आज के दौर में जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव युवाओं पर हावी होता जा रहा है, ऐसे में ब्रह्मचारी देवव्रत महेश रेखे जैसा युवा न केवल अपने परिवार एवं काशी वरन् संपूर्ण भारतवर्ष के लिए गौरव का विषय है। उनकी यह उपलब्धि आने वाली अनेक पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि वैदिक ज्ञान आज भी जीवंत है और यदि संकल्प हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।जयतु संस्कृतम् ! जयतु भारतम् !

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