एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग का आरोप, पति के बाद बेटे की हत्या करके ब्राह्मण परिवार को फसाया
पहले पति की हत्या के मामले में परिवार के युवक को जेल भेजने का आरोप, बाद में छह वर्षीय बच्चे की मौत में भी परिवार के लोगों को फंसाने का दावा; पीड़ित परिवार ने आयोग और प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई
मथुरा। मथुरा जिले के नौहझील ब्लॉक क्षेत्र के भैरई गांव से सामने आया एक मामला कानून के इस्तेमाल, कथित झूठे मुकदमों और मुआवजे की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ब्राह्मण परिवार ने आरोप लगाया है कि परिवार को लगातार मुकदमों में फंसाया गया और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा। परिवार का दावा है कि एक महिला ने पहले अपने पति की हत्या के मामले में परिवार के एक युवक को जेल भिजवाया और बाद में मुआवजा मिलने के बाद परिवार के दूसरे सदस्यों को भी बच्चे की हत्या के मामले में फंसा दिया गया।
यह पूरा मामला पुरानी घटनाओं, आपसी विवाद, हत्या के आरोपों, पुलिस कार्रवाई और मुआवजे से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध समाचार-कतरन में पीड़ित परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर बताया गया है कि परिवार को लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक परेशानी का सामना करना पड़ा। परिवार का कहना है कि जिन लोगों को आरोपी बनाया गया, उनमें से कई खुद को निर्दोष बताते रहे और अधिकारियों से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते रहे।
समाचार-कतरन के अनुसार, मामला मथुरा के नौहझील ब्लॉक के भैरई गांव का है। यहां रहने वाले ब्राह्मण परिवार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाया है। परिवार के अनुसार, घटनाओं की शुरुआत एक महिला द्वारा अपने पति की हत्या के मामले में परिवार के एक युवक को आरोपी बनाए जाने से हुई।
पति की हत्या के मामले में युवक को जेल भेजे जाने का आरोप
परिवार का आरोप है कि गांव की एक महिला ने अपने पति की हत्या के मामले में इस परिवार के युवक को आरोपी बनाया था। इसके बाद युवक को जेल भेज दिया गया। मामले में आगे चलकर अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत मुआवजे की प्रक्रिया भी सामने आई।
कतरन में उल्लेख है कि इस मामले में करीब साढ़े आठ लाख रुपये का मुआवजा मिलने के बाद विवाद ने नया मोड़ लिया। पीड़ित परिवार का आरोप है कि मुआवजे की राशि मिलने के बाद परिवार के अन्य सदस्यों को भी एक दूसरे गंभीर मामले में फंसा दिया गया।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री से नहीं होती है। ऐसे मामलों में यह महत्वपूर्ण है कि पुलिस जांच, अदालत के रिकॉर्ड और प्रशासनिक दस्तावेजों के आधार पर ही आरोपों की अंतिम सत्यता तय हो।
छह वर्षीय बच्चे प्रिंस की मौत से मचा हड़कंप
मामले का दूसरा और बेहद गंभीर पहलू छह वर्षीय बच्चे प्रिंस की मौत से जुड़ा है। समाचार-कतरन के अनुसार, 19 जुलाई को गुड्डी का छह वर्षीय बच्चा प्रिंस लापता हो गया था। परिवार और ग्रामीणों के लिए बच्चे का अचानक गायब होना चिंता का कारण बन गया।
अगले दिन बच्चे का शव गांव के एक कुएं से बरामद होने की बात सामने आई। मासूम बच्चे का शव मिलने के बाद गांव में सनसनी फैल गई। परिजनों और ग्रामीणों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
कतरन में दावा किया गया है कि जांच के दौरान बच्चे की हत्या का आरोप उसकी मां गुड्डी और उसके देवर पर लगाया गया। इसी मामले में पीड़ित ब्राह्मण परिवार के कई लोगों को भी आरोपी बनाए जाने की बात समाचार में कही गई है।
परिवार का कहना है कि बच्चे की हत्या से उनका कोई संबंध नहीं था और उन्हें साजिश के तहत मामले में फंसाया गया। परिवार ने प्रशासन से मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक दोषियों की पहचान हो सके और निर्दोष लोगों को राहत मिल सके।
एक के बाद एक मुकदमों से परिवार परेशान
पीड़ित परिवार के मुखिया बनवारी लाल के हवाले से समाचार-कतरन में कहा गया है कि बच्चे की हत्या के मामले में घर की दो महिलाओं समेत छह लोगों को आरोपी बनाया गया। परिवार का दावा है कि आरोप लगाए जाने के बाद उन्हें सामाजिक और मानसिक रूप से भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
परिवार का कहना है कि लगातार मुकदमे और पुलिस कार्रवाई उनके लिए किसी गंभीर यातना से कम नहीं रहे। आरोप है कि परिवार के सदस्यों को लंबे समय तक भय और तनाव के माहौल में रहना पड़ा।
बनवारी लाल के अनुसार, परिवार के लोगों ने अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली। परिवार अब चाहता है कि पूरे प्रकरण की दोबारा निष्पक्ष समीक्षा हो और जिन लोगों को गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है, उनके संबंध में उचित कार्रवाई की जाए।
एससी-एसटी एक्ट के तहत मुआवजे पर भी उठाया सवाल
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दिए गए मुआवजे को लेकर है। समाचार-कतरन के अनुसार, उत्तर प्रदेश एससी-एसटी आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष बृजलाल ने जिलाधिकारी को निर्देश दिए कि कथित हत्या के मामले में संबंधित महिला को एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दिए गए मुआवजे की राशि की वसूली की जाए।
यह निर्देश यदि आधिकारिक रूप से दर्ज है तो यह मामले की प्रशासनिक जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। हालांकि, मुआवजा वापस लेने का निर्णय किन दस्तावेजों और जांच निष्कर्षों के आधार पर लिया गया, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध समाचार-कतरन में नहीं है।
ऐसे मामलों में मुआवजे की व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ितों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि जांच या न्यायिक प्रक्रिया में यह सामने आता है कि किसी मामले में गलत जानकारी या गलत आरोप के आधार पर लाभ लिया गया, तो उस पर प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान हो सकता है। इसीलिए इस मामले में वास्तविक रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच का महत्व बढ़ जाता है।
परिवार का दावा—पहले पति, फिर बेटे की मौत के मामले में फंसाया
पीड़ित परिवार ने पूरे घटनाक्रम को एक सिलसिले के रूप में प्रस्तुत किया है। परिवार के अनुसार, पहले पति की हत्या के मामले में उनके परिवार के एक युवक को आरोपी बनाकर जेल भेजा गया। इसके बाद मुआवजे की राशि मिलने की बात सामने आई। फिर छह वर्षीय बच्चे प्रिंस की मौत के मामले में परिवार के कई लोगों को आरोपी बनाए जाने का आरोप लगाया गया।
परिवार का कहना है कि दोनों मामलों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि अलग-अलग घटनाओं में लगाए गए आरोपों के पीछे वास्तविक तथ्य क्या हैं।
परिवार ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रशासन और संबंधित आयोग से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं तो उसे केवल आरोपों के आधार पर लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में परेशान नहीं किया जाना चाहिए।
कुएं में मिला था बच्चे का शव
प्रिंस की मौत मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि छह वर्षीय बच्चे का शव कुएं से बरामद होने की बात समाचार-कतरन में कही गई है। किसी बच्चे का इस तरह लापता होना और अगले दिन शव मिलना अपने आप में गंभीर आपराधिक जांच का विषय है।
ऐसे मामलों में पुलिस के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल होते हैं—बच्चा आखिरी बार किसके साथ देखा गया, वह घर से कब निकला, कुएं तक कैसे पहुंचा, शव की स्थिति क्या थी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण क्या सामने आया, घटनास्थल से कौन-कौन से साक्ष्य मिले और मोबाइल फोन या अन्य तकनीकी साक्ष्यों से क्या जानकारी सामने आई।
इन्हीं सवालों के जवाब किसी भी हत्या के मामले में आरोपों की पुष्टि या खंडन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों के साथ-साथ जांच एजेंसियों के आधिकारिक निष्कर्षों को भी सामने रखना आवश्यक है।
निर्दोष लोगों को आरोपी बनाने का आरोप
बनवारी लाल और उनके परिवार की ओर से आरोप लगाया गया कि बच्चे की हत्या के मामले में परिवार की दो महिलाओं सहित छह लोगों को फंसा दिया गया। परिवार का कहना है कि उन्होंने बच्चे की हत्या नहीं की और उन्हें झूठे आरोपों का सामना करना पड़ा।
समाचार-कतरन में यह भी उल्लेख है कि पीड़ित परिवार लंबे समय तक इस कथित उत्पीड़न को झेलता रहा। परिवार की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक दोषियों पर कार्रवाई की जाए।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोप लगना और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होती है। इसलिए इस मामले में भी सभी पक्षों की बात और आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
मामले ने स्थानीय प्रशासन के सामने भी कई सवाल खड़े किए हैं। यदि परिवार की शिकायत सही पाई जाती है तो आरोपों के आधार पर लंबे समय तक मुकदमे झेल रहे निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी। वहीं दूसरी ओर, यदि बच्चे की हत्या अथवा पहले पति की हत्या के मामलों में लगाए गए आरोपों के पीछे ठोस साक्ष्य मौजूद हैं तो वास्तविक अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी जरूरी है।
यही वजह है कि दोनों मामलों की निष्पक्ष और तथ्य आधारित जांच इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन जाती है।
एससी-एसटी कानून की जरूरत और दुरुपयोग की बहस
एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जातिगत अत्याचार, भेदभाव और हिंसा से कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। कानून के तहत पीड़ितों को कई परिस्थितियों में आर्थिक सहायता और अन्य राहत भी उपलब्ध कराई जाती है।
लेकिन किसी भी कानून की तरह इसके इस्तेमाल में भी जांच और प्रक्रिया का महत्व रहता है। यदि किसी मामले में कानून का गलत इस्तेमाल होने का आरोप सामने आता है तो उसकी जांच तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर होनी चाहिए।
भैरई गांव का यह मामला इसी व्यापक बहस को सामने लाता है कि एक तरफ वास्तविक पीड़ितों को कानून का संरक्षण मिले, वहीं दूसरी तरफ यदि किसी व्यक्ति पर गलत आरोप लगाए गए हों तो उसे भी निष्पक्ष जांच और न्याय का अधिकार मिले।
परिवार ने मांगी पुराने मामले की भी समीक्षा
समाचार-कतरन के अनुसार, परिवार अब पहले मामले की भी पुनर्विवेचना चाहता है। परिवार का दावा है कि पति की हत्या के मामले में उनके परिवार के युवक को गलत तरीके से फंसाया गया था।
परिवार चाहता है कि पुराने मामले की जांच में सामने आए सभी तथ्यों, गवाहों और साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की जाए। इसके साथ ही बच्चे प्रिंस की मौत से जुड़े मामले में भी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
परिवार का कहना है कि दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय उपलब्ध दस्तावेजों और घटनाक्रम के आधार पर पूरी तस्वीर सामने लाई जानी चाहिए।
न्याय की मांग पर टिकी निगाहें
भैरई गांव के इस मामले में फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत तथ्य सामने लाने की है। परिवार की ओर से लगाए गए आरोप गंभीर हैं, लेकिन आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकती है।
एक ओर छह वर्षीय बच्चे की मौत ने पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है, वहीं दूसरी ओर परिवार द्वारा झूठे मुकदमों और मुआवजे के कथित दुरुपयोग के आरोपों ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
यदि परिवार की शिकायत पर दोबारा जांच होती है तो पुलिस और प्रशासन के लिए जरूरी होगा कि प्रत्येक आरोप की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए। घटनास्थल, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान, एफआईआर, केस डायरी, मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्यों तथा मुआवजे से संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा से ही सच्चाई तक पहुंचा जा सकता है।
निष्कर्ष
मथुरा के भैरई गांव का यह प्रकरण केवल एक परिवार के आरोप और प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। इसमें एक बच्चे की मौत, पहले हुई हत्या से जुड़ा मुकदमा, कई लोगों के आरोपी बनाए जाने, एससी-एसटी कानून के तहत मुआवजे और कथित रूप से निर्दोष लोगों को फंसाए जाने जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उसने लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक परेशानी झेली है और अब वह न्याय की उम्मीद में प्रशासन का दरवाजा खटखटा रहा है। परिवार चाहता है कि दोनों मामलों की निष्पक्ष जांच हो, वास्तविक दोषियों पर कार्रवाई हो और यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से फंसाया गया है तो उसे राहत मिले।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि आरोपों और दावों के साथ-साथ आधिकारिक जांच के निष्कर्ष भी सार्वजनिक रूप से सामने आएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पति की हत्या और छह वर्षीय प्रिंस की मौत के मामलों में वास्तविक घटनाक्रम क्या था और किन लोगों की भूमिका प्रमाणित हुई।

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

