सेंगर की रिहाई -एडिटर राकेश पांडेय का निस्पछ विश्लेषण-Sengar’s release: An impartial analysis by editor Rakesh Pandey

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Sengar’s release: An impartial analysis by editor Rakesh Pandey दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को निलंबित करने का फैसला बहुत ही तकनीकी कानूनी आधार और तथ्यात्मक बिंदुओं पर लिया है। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत और CBI ने कानून की व्याख्या और सबूतों को समझने में गंभीर चूक की है।

1. मोबाइल फोन का रहस्य (गिरना vs. मिलना)

​CBI/पीड़िता की कहानी में सबसे बड़ा झोल: ​पीड़िता ने कहा था कि घटना वाले दिन (4 जून 2017) जब वह कुलदीप सेंगर के घर गई थी, तो रेप के बाद उसका मोबाइल फोन और सिम कार्ड छीन लिया गया था या गिर गया था। ​CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) का सच: कोर्ट में पेश किए गए कॉल रिकॉर्ड्स कुछ और ही कहानी बयां कर रहे थे। ​रिकॉर्ड्स से पता चला कि जिस सिम/फोन को ‘खोया’ या ‘छीना’ हुआ बताया गया, वह घटना के बाद भी एक्टिव था। ​उस नंबर से कई कॉल किए गए थे। ​हाई कोर्ट का सवाल: कोर्ट ने माना कि अगर फोन छीन लिया गया था, तो वह एक्टिव कैसे था? और अगर पीड़िता के पास फोन था, तो उसने तुरंत पुलिस या परिवार को फोन क्यों नहीं किया? यह घटनाक्रम शक पैदा करता है।

2. केस दर्ज कराने में देरी ​

कानून में रेप जैसे मामलों में अगर FIR दर्ज कराने में बहुत देरी होती है, तो ठोस कारण बताना होता है। यहाँ यही सबसे बड़ी कमी रही। ​ ​कथित घटना: 4 जून 2017 ​पहली शिकायत (जो पुलिस को दी गई): अगस्त 2017 (लगभग 2 महीने बाद)। ​सेंगर का नाम गायब: सबसे हैरानी की बात यह थी कि जब पीड़िता ने पहली बार पुलिस में शिकायत की, तो उसमें कुलदीप सिंह सेंगर का नाम ही नहीं था। ​शुरुआती शिकायत में आरोप ‘शुभम सिंह’ और नीरज तिवारी एवं अन्य लोगों पर लगाए गए थे। ​सेंगर का नाम और रेप का आरोप बहुत बाद में (अगस्त में) जोड़ा गया। ​हाई कोर्ट का तर्क: कोर्ट ने माना कि यह बाद में सोची-समझी साजिश हो सकती है। जब इतनी बड़ी घटना हुई, तो मुख्य आरोपी का नाम पहली शिकायत में क्यों नहीं था? यह देरी और नाम का बाद में जुड़ना संदेह पैदा करता है कि कहीं किसी के कहने पर (Political rivalry) तो ऐसा नहीं किया गया। ​

3. बयानों में बार-बार बदलाव ​

पीड़िता ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग बयान दिए, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे। ​धारा 164 का बयान (मजिस्ट्रेट के सामने): ​पहले बयान में पीड़िता ने कहा था कि उसे अगवा किया गया था और बेचा गया था, लेकिन उसने सेंगर द्वारा रेप की बात साफ तौर पर नहीं कही थी। ​बाद में उसने अपना बयान बदला और कहा कि सेंगर ने रेप किया था। ​मेडिकल हिस्ट्री में चुप्पी: जब घटना के बाद पीड़िता का मेडिकल चेकअप हुआ, तो उसने डॉक्टर को रेप के बारे में या सेंगर के बारे में कुछ नहीं बताया। आमतौर पर पीड़िता डॉक्टर को सबसे पहले सच बताती है। ​ट्रायल कोर्ट की गलती: निचली अदालत ने इन बदलते बयानों को नजरअंदाज कर दिया और माना कि पीड़िता डरी हुई थी। लेकिन हाई कोर्ट का मानना है कि बयानों में इतना बड़ा बदलाव (आरोपी का नाम ही न होना और फिर आ जाना) सामान्य नहीं है और इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए था।

4. पीड़िता की नाबालिग होने पर संदेह

​ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसमें जांच की कमी पाई। ​CBI/ट्रायल कोर्ट की गलती: उम्र साबित करने के लिए दस्तावेजों की ठीक से जांच नहीं की गई। ​हाई कोर्ट की टिप्पणी: रिकॉर्ड पर तीन अलग-अलग दस्तावेज हैं:

A. ​स्कूल का ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC)।

B. ​स्कूल का एडमिशन रजिस्टर और

3.​मेडिकल ओसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी की जांच)। ​

इन तीनों में अलग-अलग जन्म तिथियां हैं। स्कूल रिकॉर्ड में लिखी जन्मतिथि 2001 को मिटाकर दोबारा लिखा गया था। हर मेडिकल टेस्ट के हिसाब से पीड़िता घटना के वक्त 18 साल से ऊपर (बालिग) थी। एक में वह 19 साल से ऊपर थी। ऐसे में अगर वह बालिग साबित होती हैं, तो पूरा पॉक्सो एक्ट ही केस से हट जाएगा। हाई कोर्ट ने इसे विचारणीय मुद्दा माना।

5. कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और लोकेशन की अनदेखी ​

ट्रायल कोर्ट की गलती: ट्रायल कोर्ट ने मोबाइल टावर लोकेशन (CDR) के सबूतों को ज्यादा महत्व नहीं दिया था। ​तथ्य: सेंगर के वकीलों ने सबूत पेश किए कि घटना के समय सेंगर की मोबाइल लोकेशन उस जगह (माखी गांव) पर नहीं थी, बल्कि वहां से 15-16 किलोमीटर दूर उनके ऑफिस या किसी समारोह में थी। पीड़िता ने कहा था कि उनके साथ 8 से 8:30 बजे के बीच रेप हुआ। ऐसे में 30 मिनट में 15 किलोमीटर आकर रेप करना और फिर 15 किलोमीटर जाकर एक मीटिंग अटेंड करना संभव नहीं है। ​हाई कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने लोकेशन के सबूतों को खारिज करने में जल्दबाजी की। अपील के दौरान इस पर गहराई से सुनवाई की जरूरत है।

6. मेडिकल सबूतों में कमी

​CBI की कमी: घटना के काफी समय बाद लड़की ने इसकी जानकारी दी थी। एफआईआर भी काफी समय बाद दर्ज हुई थी, इसलिए कोई ठोस फोरेंसिक सबूत (जैसे DNA या सीमन) नहीं मिला था। यह केस पूरी तरह से गवाहों के बयानों पर आधारित था। ​हाई कोर्ट का तर्क: जब ठोस मेडिकल सबूत नहीं होते और केस सिर्फ बयानों पर चलता है, तो गवाहों की विश्वसनीयता की बहुत बारीकी से जांच होनी चाहिए, जो निचली अदालत ने पूरी तरह नहीं की।

7. “फर्जी” ईमेल और सबूत

​जांच के दौरान एक ईमेल आईडी का भी जिक्र आया जो पीड़िता के नाम से बनाई गई थी और जिससे शिकायतें भेजी गई थीं। ​जांच में पता चला कि वह ईमेल आईडी और उसका पासवर्ड किसी और के पास था (शायद परिवार का कोई सदस्य या जानकार), और उसका इस्तेमाल सबूत बनाने के लिए किया जा रहा था। इससे यह शक गहरा गया कि पीड़िता को कोई और ‘गाइड’ (Tutor) कर रहा था।

8. “लोक सेवक” (Public Servant) की परिभाषा में गलती और गलत सजा

​यह इस पूरे फैसले का सबसे मजबूत आधार है जिस पर हाई कोर्ट ने सजा रोकी है। ​ट्रायल कोर्ट/CBI की गलती: निचली अदालत ने सेंगर को पॉक्सो एक्ट की धारा 5(c) के तहत दोषी माना था। यह धारा तब लगती है जब कोई ‘लोक सेवक’ रेप करता है। ट्रायल कोर्ट ने तर्क दिया कि चूंकि सेंगर एक विधायक थे, इसलिए वह ‘पब्लिक सर्वेंट’ हैं। इसी आधार पर उन्हें “जीवन भर के लिए उम्रकैद” की सजा दी गई। ​हाई कोर्ट का सुधार: हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कानून को गलत पढ़ा। ​भ्रष्टाचार निरोधक कानून में तो विधायक ‘पब्लिक सर्वेंट’ होता है, लेकिन पॉक्सो एक्ट में ‘पब्लिक सर्वेंट’ का मतलब अलग है। ​पॉक्सो एक्ट की धारा 5(c) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ केवल वे माने जाते हैं जिनके पास Authority होती है और जिनके पास नाबालिग की कस्टडी या सुरक्षा की जिम्मेदारी हो (जैसे- जेलर, पुलिस, रिमांड होम का इंचार्ज, शिक्षक या डॉक्टर)। ​

निष्कर्ष: एक विधायक के पास आम जनता के प्रति जिम्मेदारी होती है, लेकिन किसी “विशिष्ट नाबालिग” के ऊपर उसका सीधा नियंत्रण या कस्टडी नहीं होती। इसलिए, उन पर धारा 5(c) (जो सबसे सख्त सजा देती है) लागू नहीं होनी चाहिए थी।

9. सजा की अवधि: 7 साल बनाम उम्रकैद ​

हाई कोर्ट ने सजा की अवधि को लेकर ट्रायल कोर्ट के फैसले में विरोधाभास पाया। ​तथ्य: कुलदीप सेंगर अप्रैल 2018 से जेल में हैं। इस आदेश तक उन्होंने लगभग साढ़े 7 साल 5 महीने जेल में बिता लिए हैं। ​तकनीकी बिंदु: अगर धारा 5(c) (पब्लिक सर्वेंट वाली धारा) हटा दी जाए, तो उन पर केवल साधारण रेप (IPC 376) या पॉक्सो की धारा 4 का मामला बनता है। दर​असल, 2017 (जब अपराध हुआ था) के कानून के मुताबिक, साधारण पॉक्सो मामले में न्यूनतम सजा 7 साल थी। २019 के संशोधन में यह सजा बढ़ाकर न्यूनतम 7 साल की गई। ​

कोर्ट का तर्क: चूंकि सेंगर पहले ही 7.5 साल जेल काट चुके हैं, जो कि न्यूनतम सजा से ज्यादा है, तो अपील लंबित रहने के दौरान उन्हें जेल में रखना अन्याय होगा। अगर बाद में फैसला उनके पक्ष में आता है, तो वह एक्स्ट्रा सजा काट चुके होंगे जिसे वापस नहीं किया जा सकता।

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Rakesh Pandey

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।