ऐतिहासिक गुलामी का सच और आरक्षण की राजनीति – The politics of reservation

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दिल्ली, 7 दिसंबर 2025। The politics of reservation सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है जिसमें दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान हिंदू गुलामों की कीमतों का जिक्र है। किताब “Studies in Islamic History and Slavery” (लेखक: एम.ए. खान, पेज 443-45) के हवाले से बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के समय एक सुंदर हिंदू लड़की (जो घरेलू नौकरानी और रखैली दोनों का काम करती हो) की कीमत 20 से 40 टंका (यानी 2 से 4 सोने के दीनार) तक होती थी, जबकि सामान्य पुरुष गुलाम 100-200 टंका में बिकते थे।

बाद के सुल्तानों के दौर में कीमतें और भी गिर गईं। मुहम्मद शाह तुगलक (1325-51) के समय दिल्ली में एक जवान गुलाम लड़की घरेलू काम के लिए सिर्फ 8 टंका में मिल जाती थी और जो “दोहरे काम” (domestic maid + concubine) के लिए फिट समझी जाती थी, वह 15 टंका में बिकती थी। इतिहासकार इब्न बतूता ने खुद लिखा है कि उसने बंगाल में एक सोने का सिक्का (10 टंका) देकर एक खूबसूरत गुलाम लड़की खरीदी थी, जबकि उसके दोस्त ने दो सिक्कों में एक जवान लड़का खरीदा।

ये आंकड़े कोई नई खोज नहीं हैं। के.एस. लाल, इरफान हबीब, आ Andre Wink जैसे इतिहासकारों ने दशकों से लिख रखा है कि 8वीं से 18वीं सदी तक भारत में लाखों हिंदू युद्धबंदी गुलाम बनाए गए। सुल्तान महमूद गजनवी के 1019 के हमले में 53,000 कैदी सिर्फ 2 से 10 दिरहम प्रति व्यक्ति बिके। हसन निजामी ने लिखा है कि नमक रेंज (साल्ट रेंज) के हिंदुओं पर मुहम्मद गौरी और कुतुबुद्दीन ऐबक के संयुक्त हमले में इतने कैदी आए कि “पांच हिंदू गुलाम एक दीनार में बिकने लगे”।

यही वजह थी कि दिल्ली सल्तनत के दौर में गुलाम व्यापार इतना बड़ा धंधा बन गया कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को गुलामों की कीमतें तय करनी पड़ीं – ठीक वैसे ही जैसे आज सरकारें प्याज-आलू की कीमतें तय करती है।इन ऐतिहासिक तथ्यों को आज सोशल मीडिया पर एक खास संदर्भ में पेश किया जा रहा है।

पोस्ट लिखने वाला कह रहा है:“जिनकी अम्मा-दादी सिर्फ 8 दीनार में और दादा सिर्फ 2 दीनार में मुगलों-तुर्कों के बाजारों में बिककर गुलाम बन जाती थीं, जिनकी अम्मा-दादी गुलाम कामवाली बाई और बच्चों को जन्म देने दोनों का काम करती थीं, और दादा गुलाम बनकर महल-किले बनाते थे – वही लोग आज 3000 साल के ‘शोषण’ का दावा करके आरक्षण मांग रहे हैं।

”यह पोस्ट स्पष्ट रूप से आज के आरक्षण लाभार्थी समुदायों (खासकर कुछ OBC और SC-ST श्रेणियों) को निशाना बना रही है। दावा यह है कि जिनके पूर्वज मध्यकाल में सबसे ज्यादा गुलाम बनाए गए, वही लोग आज “शोषित” का तमगा लगाकर लाभ ले रहे हैं, जबकि वास्तव में शोषण करने वाले लोग तो अलग थे।

ऐतिहासिक तथ्य क्या कहते हैं? The politics of reservation

  1. मध्यकालीन भारत में सबसे ज्यादा गुलाम हिंदू ही बनाए गए – इसमें कोई विवाद नहीं है। मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिर तोड़े, गांव जलाए और लाखों लोगों को गुलाम बनाया।
  2. ये गुलाम हर वर्ग से थे – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, आदिवासी – सब शामिल थे। कोई जाति इससे अछूती नहीं रही।
  3. गुलाम बनने के बाद जाति का कोई मतलब नहीं रह जाता था। एक हिंदू गुलाम की कीमत उसकी उम्र, सूरत और काम करने की क्षमता से तय होती थी, न कि उसकी जाति से।
  4. बहुत से गुलाम बाद में मुस्लिम बना लिए गए। उनके वंशज आज भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के मुस्लिम समुदाय में हैं। बहुत से हिंदू बने रहे – उनके वंशज आज हिंदू समाज के हर वर्ग में हैं।

आरक्षण की वास्तविकताभारत में आरक्षण मूल रूप से दो आधारों पर दिया गया था:

  • सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ापन (मंडल आयोग)
  • अछूत प्रथा के कारण ऐतिहासिक भेदभाव (अनुसूचित जाति)

मध्यकालीन गुलामी का इससे कोई सीधा संबंध नहीं है। आज जो समुदाय OBC या SC में आरक्षण ले रहे हैं, उनके पूर्वजों में कुछ मध्यकाल में गुलाम बने होंगे, कुछ नहीं भी बने होंगे। ठीक वैसे ही जैसे आज के कई “सवर्ण” परिवारों के पूर्वज भी गुलाम बनाए गए थे (जिनके नाम बाद में “खान” या “सैयद” हो गए या हिंदू रह गए)।

सवाल उठता है

  • क्या मध्यकालीन गुलामी को आज के आरक्षण के खिलाफ हथियार बनाना उचित है?
  • क्या यह बहस इसलिए शुरू की जा रही है क्योंकि कुछ लोग जातिगत आरक्षण को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं?
  • या यह सिर्फ एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है कि “हमारे पूर्वज भी तो शोषित थे, फिर सिर्फ इन्हें ही आरक्षण क्यों?”

हाँ, मध्यकाल में हिंदुओं के साथ भयानक अत्याचार हुए। लाखों लोग गुलाम बने। उनकी कीमतें इतनी कम थीं कि आज के हिसाब से एक स्मार्टफोन भी उससे महंगा है। यह शर्मनाक इतिहास है जिसे पढ़ाया जाना चाहिए।

लेकिन उस इतिहास को आज के आरक्षण की राजनीति में घसीटकर हम न तो उस अन्याय का बदला ले रहे हैं, न ही आज के सामाजिक न्याय को मजबूत कर रहे हैं। हम सिर्फ एक नया वैमनस्य पैदा कर रहे हैं।

असली सवाल यह है – क्या हम 800 साल पुराने शोषण के आंकड़े लेकर आज के भारत को बांटते रहेंगे, या यह स्वीकार करेंगे कि उस दौर में हर हिंदू (चाहे किसी भी जाति का हो) शिकार था और आज की जरूरत आर्थिक आधार पर समान अवसर देने की है, न कि पुरानी गुलामी के सर्टिफिकेट बांटने की।

रणधीर आनंद पांडेय

रणधीर आनंद पांडेय ब्यूरो चीफ रिलाएबल मीडिया भारत बस्ती ,उत्तर प्रदेश है RMB में 10 वर्षो से रहकर पत्रकारिता कर रहे है।