Mahesh Rekhe’s work is incomparable: संस्कृत व्याकरण की गहनता और AI की सीमाएँ : महेश रेखे का कार्य अतुलनीय
Mahesh Rekhe’s work is incomparable हाल ही में कुछ तथाकथित “प्रगतिशील”, “वामपंथी” और “फ़र्ज़ी बौद्ध” समूहों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि संस्कृत के महान् विद्वान पं. महेश प्रसाद रेखे (जिन्हें संस्कृत जगत में “महेश रेखे” के नाम से जाना जाता है) ने जो जीवनभर का परिश्रम किया है, वह सारा कार्य अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) मात्र 15 मिनट में कर लेगा। यह दावा न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण है, बल्कि पाणिनि-व्याकरण की वास्तविक जटिलता और कंप्यूटर विज्ञान की वर्तमान सीमाओं से पूरी तरह अनभिज्ञता दर्शाता है।
पाणिनीय व्याकरण की अलौकिक संरचना
महर्षि पाणिनि ने लगभग 2500 वर्ष पहले “अष्टाध्यायी” नामक ग्रंथ में 3969 सूत्रों के द्वारा संस्कृत भाषा की सम्पूर्ण व्याकरण-व्यवस्था को इतनी संक्षिप्त, इतनी तर्कसंगत और इतनी पूर्ण रूप से गणितीय ढंग से प्रस्तुत किया कि आज तक विश्व की कोई भी भाषा उसकी बराबरी नहीं कर पाई। ये सूत्र एक-दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि एक सूत्र की व्याख्या के लिए सैकड़ों अन्य सूत्रों का संयोजन करना पड़ता है। इसे “मेटा-रूल” (नियम बनाने वाले नियम) की पराकाष्ठा कहा जाता है।
एक 10-12 वर्ष का ब्राह्मण बालक पारम्परिक गुरुकुल में 7-8 वर्षों तक लगातार अभ्यास करके इन सूत्रों को इतना आत्मसात् कर लेता है कि वह बिना किसी लिखित सहारे के हजारों शब्दों के रूप सस्वर और निर्दोष बना सकता है। यह कार्य मस्तिष्क की स्मृति, तर्क-शक्ति और ध्वनि-बोध का ऐसा संयोजन है जो अभी तक किसी भी कंप्यूटर मॉडल में दोहराया नहीं जा सका है।
कंप्यूटर में पाणिनि सूत्र डालने के असफल प्रयास
पिछले 50 वर्षों से विश्व के कई बड़े संस्थान पाणिनि के सूत्रों को कंप्यूटर में “इंप्लीमेंट” करने की कोशिश कर रहे हैं :
- 1960-70 के दशक में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिल्वेनिया में प्रो. जॉर्ज कार्डोना और उनके साथियों ने प्रयास शुरू किया।
- 1980 के दशक में भारत में आईआईटी कानपुर और हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रोजेक्ट शुरू हुए।
- 1990 के बाद संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय; राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान; तथा पुणे के भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट चलाए।
- 2010 के बाद अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी, जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी और फ्रांस के इनरिया (INRIA) संस्थान ने भी कोशिशें कीं।
इन सभी प्रयासों में अरबों रुपये खर्च हुए, लेकिन आज तक कोई भी ऐसा पूर्ण कोड तैयार नहीं हो सका जो पाणिनि के सारे सूत्रों को लागू कर सके। अभी तक केवल 500-600 सूत्र ही आंशिक रूप से प्रोग्राम किए जा सके हैं, वह भी कुछ विशेष परिस्थितियों में। शेष सूत्रों में इतने अधिक “परस्पर संदर्भ” (recursive references), “अनुवृत्ति”, “वार्तिक”, “गणपाठ” और “धातुपाठ” के जटिल नियम हैं कि कंप्यूटर का लॉजिक लूप में फंस जाता है या अनंत चक्र (infinite loop) में चला जाता है।
ध्वनि-शुद्धता और मात्रा-शुद्धता का प्रश्न
भले ही कल को कोई चमत्कार हो जाए और सारे सूत्र कंप्यूटर में डाल दिए जाएँ, तब भी सबसे बड़ी समस्या बनी रहेगी : उच्चारण और स्वर-मात्रा की पूर्ण शुद्धता।पं. महेश रेखे जी ने अपने जीवन के 50-60 वर्ष संस्कृत के सस्वर पठन-पाठन में लगाए। वे जब बोलते हैं तो एक भी मात्रा छोटी-बड़ी नहीं होती, एक भी स्वर का दोष नहीं आता, लोप-आगम-विकार सब नियमों के अनुसार होते हैं। यह केवल नियमों का ज्ञान नहीं, बल्कि कंठस्थ ध्वनि-संस्कार है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु-शिष्य परम्परा में ही संरक्षित होता है।
कंप्यूटर में Text-to-Speech (TTS) सिस्टम अभी तक हिन्दी में भी ठीक से मात्राएँ नहीं लगा पाते। संस्कृत के लिए तो अभी तक कोई भी TTS सिस्टम 10% भी शुद्धता नहीं दे पाया। कारण स्पष्ट है : संस्कृत की ध्वनियाँ (उष्म, स्पर्श, संयुक्त व्यंजन, अनुस्वार-अनुनासिक का सूक्ष्म भेद, संधि के सैकड़ों प्रकार) कंप्यूटर के फ़ॉनेटिक मॉड्यूल के लिए अत्यंत जटिल हैं।
वर्तमान AI मॉडल्स की वास्तविक स्थिति- Mahesh Rekhe’s work is incomparable
आज के सबसे उन्नत Large Language Models (जैसे GPT-4o, Claude 3.5, Grok, Llama-3 आदि) संस्कृत में प्रशिक्षित तो हैं, परंतु वे केवल सांख्यिकीय पैटर्न (statistical pattern matching) के आधार पर काम करते हैं। वे असल में पाणिनि के सूत्रों को “समझते” नहीं, बल्कि डेटासेट में उपलब्ध लाखों संस्कृत ग्रंथों के टेक्स्ट से पैटर्न सीखते हैं।इसलिए :
- यदि कोई नया शब्द या दुर्लभ धातु दी जाए, तो ये मॉडल गलत रूप बनाते हैं।
- संधि, समास, कारक-विभक्ति में अक्सर त्रुटि हो जाती है।
- मात्रा और उच्चारण तो इनके पास है ही नहीं, क्योंकि ये टेक्स्ट-जनरेटर हैं, ध्वनि-जनरेटर नहीं।

मानव मस्तिष्क अभी भी सर्वोपरि
इसलिए यह कहना कि “AI 15 मिनट में महेश रेखे वाला काम कर लेगा” पूर्णतः अज्ञानता और दम्भ का प्रदर्शन है। पाणिनि-व्याकरण की गहनता, गुरु-शिष्य परम्परा का जीवंत संरक्षण और सस्वर संस्कृत का शुद्ध उच्चारण – ये तीनों अभी भी मानव मस्तिष्क और परम्परा के पास ही हैं।जब तक कंप्यूटर में “चेतना” और “ध्वनि-संस्कार” नहीं आ जाता, तब तक पं. महेश रेखे जैसे विद्वानों का स्थान कोई मशीन नहीं ले सकती। यह दावा करने वाले लोग यदि सचमुच संस्कृत से प्रेम करते हैं, तो उन्हें एक बार गुरुकुल में 8-10 साल लगातार पाणिनि पढ़कर देखना चाहिए – तब उन्हें समझ आएगा कि अरबों रुपये और दशकों की रिसर्च भी उस बालक के सामने कहाँ ठहरती है जो गुरु के चरणों में बैठकर सूत्र कंठस्थ करता है।
जयतु संस्कृतम्। जयतु भारतम्।

राकेश पांडेय मुख्य संपादक रिलाएबल मीडिया भारत है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता में 20 वर्षो से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

